कणों की दीर्घ साधना
आरंभ में
कण थे
अत्यंत सूक्ष्म,
पर असंख्य।
न कोई आकार,
न कोई आकांक्षा,
सिर्फ़ ऊर्जा का कंपन,
जो शून्य के विस्तार में
अपना लय खोज रहा था।
क्वार्क
क्षणांशों में जन्मे,
ग्लूऑन के सूक्ष्म सूत्रों से बँधे—
मानो अस्तित्व की पहली जपमाला
गूँथी जा रही हो।
प्रोटॉन बने,
न्यूट्रॉन स्थिर हुए,
इलेक्ट्रॉन परिक्रमा में आए
और परमाणु ने
अपनी मौन संरचना रची।
यह साधना त्वरित नहीं थी।
लाखों-करोड़ों वर्षों तक
गुरुत्व ने
धूल को धैर्य सिखाया।
निहारिकाओं की शांति में
कण एक-दूसरे के निकट आए,
संलयन की अग्नि जली,
तारे प्रज्वलित हुए।
किसी तारे के गर्भ में
कार्बन ने
अपने चार हाथ फैलाए
जीवन की दिशा में
पहला संकेत।
यह दीर्घ साधना
केवल पदार्थ की नहीं,
संरचना की थी।
अराजकता से
व्यवस्था की ओर
एक सूक्ष्म यात्रा।
और फिर
किसी ग्रह की सतह पर
जल के अणुओं ने
एक नया अनुबंध किया
रसायन से चेतना की ओर।
हम
जो सोचते हैं,
जो प्रश्न करते हैं
दरअसल
कणों की उसी साधना का परिणाम हैं।
हमारी धमनियों में बहता रक्त,
हमारी कोशिकाओं की रचना,
हमारी स्मृतियों का विद्युत-संचार—
सब उसी दीर्घ तप का विस्तार है।
कणों ने
कोई शोर नहीं किया।
उन्होंने
धीरे-धीरे,
असंख्य युगों में
अपने को संयोजित किया
जब तक कि
पदार्थ ने
अपने भीतर
चेतना की झिलमिलाहट महसूस न कर ली।
कणों की दीर्घ साधना
अब भी जारी है।
हर परिवर्तन,
हर जन्म,
हर विचार
उस तप का अगला मंत्र है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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