कई बार तुम ख़ामोशी में भी शोर बन जाती हो—
एक अनकही सी धुन,
जो मेरे भीतर देर तक बजती रहती है।
कई बार तुम सवालों में उलझी
एक मासूम पहेली लगती हो,
जिसे सुलझाने का मन नहीं करता,
बस निहारने का जी चाहता है।
तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो—
जब तुम तर्क से नहीं,
दिल से जीती हो हर लम्हा।
कभी रूठकर यूँ बैठ जाती हो
जैसे दुनिया से कोई रिश्ता ही नहीं,
और मैं सोचता रह जाता हूँ—
कि तुम्हारी उस खामोशी में
कितना कुछ कहा हुआ होता है।
कई बार तुम प्रेम में
बारिश की पहली बूँद बन जाती हो—
बेख़बर, बेकाबू,
और पूरी तरह सच्ची।
तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो…
जब तुम बस "तुम" होती हो।
— मुकेश इलाहाबादी
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