तर्क की सीढ़ियों से उतरता प्रेम
मैंने जीवन को
बहुत समय तक
तर्क की सीढ़ियों से समझा—
एक-एक पायदान पर
कारण रखे,
निष्कर्ष जोड़े।
हर भावना से कहा—
अपने होने का प्रमाण दो,
हर धड़कन से पूछा—
तुम्हारी दिशा क्या है?
और सच यह है
कि तर्क
मुझे बहुत दूर तक ले गया—
वह अंधेरे में
दीपक की तरह था।
पर एक जगह आकर
सीढ़ियाँ खत्म हो गईं।
वहाँ
कोई सूत्र नहीं था,
कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं।
बस
तुम खड़ी थीं—
शांत,
सहज,
जैसे कोई उत्तर
जिसे लिखने की ज़रूरत नहीं।
तब लगा
प्रेम ऊपर नहीं चढ़ता,
वह तो
तर्क की ऊँचाइयों से
धीरे-धीरे उतरता है।
जैसे नदी
पहाड़ों से उतरकर
मैदानों की सरलता में आ जाती है।
अब मैं जानता हूँ—
तर्क
हमें सत्य के करीब लाता है,
पर प्रेम
हमें सत्य के भीतर ले जाता है।
और जब
तर्क की सीढ़ियों से उतरकर
मैं तुम्हारे पास आता हूँ,
तो लगता है
मानो सारी जटिलता
पीछे छूट गई हो,
और जीवन
फिर से
एक सरल
और गहरे अर्थ में
धड़कने लगा हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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