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Friday, 20 March 2026

जहाँ इश्क़ इबादत बन जाता है

जहाँ इश्क़ इबादत बन जाता है

इश्क़ की सूफ़ियाना ज़बान

इश्क़ यहाँ चाहत नहीं
एक सज्दा है।
जहाँ “तुम” भी धीरे-धीरे मिटते हो,
और “मैं” भी…
बस एक “वो” रह जाता है।

यहाँ इश्क़ माँगा नहीं जाता—
किया जाता है,
जैसे कोई दरवेश
बिना आवाज़ के
रब का नाम जपता है।

1. पहली पुकार से

  1. इश्क़ पहली नज़र में नहीं, पहली पहचान में होता है—जब रूह किसी रूह को पहचान ले।

  2. वो कोई शख़्स नहीं था—वो एक आईना था, जिसमें मैंने खुद को देखा।

  3. उसकी मौजूदगी, एक आयत की तरह थी—जिसे समझने के लिए दिल चाहिए था।

  4. इश्क़ शुरू नहीं होता—वो याद आता है, जैसे कोई भूला हुआ ज़िक्र।

  5. मैंने उसे नहीं चाहा—मुझे उसकी तरफ़ बुला लिया गया।

2. फ़ना की राह में

  1. इश्क़ में सबसे पहले “मैं” मरता है—और यही उसकी पहली शर्त है।

  2. जो बचता है, वही असली इश्क़ होता है—बिना नाम, बिना दावा।

  3. मैंने उसे पाने की कोशिश छोड़ी—और उसी में खो गया।

  4. इश्क़, इकट्ठा करना नहीं—ख़ुद को मिटा देना है।

  5. जो जितना मिटा, वो उतना ही पा गया।

3. ख़ामोशी के ज़िक्र में

  1. असली इश्क़ में ज़ुबान खामोश हो जाती है—दिल ही ज़िक्र करता है।

  2. उसका नाम लेना भी एक इबादत था—और भूल जाना भी।

  3. मैंने उसे पुकारा नहीं—बस महसूस किया, और वो मौजूद हो गया।

  4. इश्क़ में आवाज़ नहीं होती—बस एक लगातार होती हुई मौजूदगी होती है।

  5. जो कहा नहीं जा सकता—वही इश्क़ का सबसे सच्चा हिस्सा है।

4. दूरी = क़ुर्बत

  1. इश्क़ में दूरी कोई फ़ासला नहीं—वो क़रीबी की एक और शक्ल है।

  2. जो नज़र नहीं आता, वही सबसे ज़्यादा मौजूद होता है।

  3. मैंने उसे खोया नहीं—बस देखने की आदत छोड़ दी।

  4. इश्क़ में मिलना ज़रूरी नहीं—महसूस होना काफ़ी है।

  5. जो दूर है, वही दिल के सबसे क़रीब होता है।

5. इबादत की सूरत में

  1. मैंने उसे चाहा नहीं—मैंने उसकी इबादत की।

  2. हर सज्दा उसी की तरफ़ था—चाहे नाम कुछ भी लिया गया हो।

  3. इश्क़ में माँगना छोड़ दो—वहीं से मिलना शुरू होता है।

  4. जो मिला नहीं, वही सबसे बड़ा करम था।

  5. इश्क़, दुआ नहीं—ख़ुद दुआ बन जाना है।

6. विसाल के पार

  1. इश्क़ का आख़िरी पड़ाव मिलना नहीं—मिट जाना है।

  2. जहाँ “मैं” और “तुम” ख़त्म हो जाएँ—वहीं “वो” शुरू होता है।

  3. मैंने उसे पाया नहीं—मैं उसी में बदल गया।

  4. इश्क़ का सच, मिलन नहीं—एकत्व है।

  5. जब तलाश ख़त्म हो जाए—समझो विसाल हो गया।

जहाँ इश्क़ खुदा हो जाता है

यहाँ इश्क़ कोई रिश्ता नहीं
एक रास्ता है।
जहाँ चलते-चलते
तुम अपने आप से खाली हो जाते हो,
और वही खालीपन
उसकी मौजूदगी से भर जाता है।

क्योंकि आख़िर में
इश्क़, इश्क़ नहीं रहता…
वो इबादत बन जाता है,
और इबादत…
ख़ुदा।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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