आस्था और तर्क का संगम
मानव चेतना के आकाश में
दो सितारे सदियों से चमकते आए हैं
एक आस्था,
और दूसरा तर्क।
आस्था
दिल की उस रोशनी का नाम है
जो अंधेरे में भी
उम्मीद का दीप जला देती है।
जब मनुष्य
जीवन के अनगिन रहस्यों के सामने खड़ा होता है,
जब ब्रह्मांड की अनंतता
उसे विस्मय से भर देती है—
तब उसके भीतर
आस्था जन्म लेती है।
वह मान लेता है
कि इस सृष्टि के पीछे
कोई गहरा अर्थ छिपा है,
कोई अदृश्य व्यवस्था
जो अस्तित्व को दिशा देती है।
दूसरी ओर
तर्क है
जो प्रश्न पूछता है,
जो हर विचार को
जाँचने और समझने की इच्छा रखता है।
तर्क
मनुष्य की बुद्धि का दीपक है,
जो
अज्ञान की धुंध को हटाकर
ज्ञान की राह दिखाता है।
पहली दृष्टि में
आस्था और तर्क
मानो दो विपरीत दिशाएँ लगती हैं।
एक
विश्वास की भूमि पर खड़ा है,
और दूसरा
प्रमाण की धरती पर।
पर यदि गहराई से देखें
तो दोनों का लक्ष्य
एक ही है
सत्य की खोज।
आस्था
मनुष्य को साहस देती है
कि वह अज्ञात की ओर बढ़ सके।
और तर्क
उसे विवेक देता है
कि वह भ्रम और अंधविश्वास से बच सके।
यदि आस्था
तर्क से दूर हो जाए
तो अंधविश्वास जन्म लेता है।
और यदि तर्क
आस्था से अलग हो जाए
तो जीवन
सूखी गणना में बदल जाता है।
इसलिए
मानव चेतना की पूर्णता
इन दोनों के संगम में है।
जब आस्था
तर्क की रोशनी से प्रकाशित होती है,
और तर्क
आस्था की संवेदना से स्पर्शित होता है—
तब
ज्ञान का एक नया क्षितिज खुलता है।
शायद
आस्था और तर्क का वास्तविक संगम
यही है—
कि मनुष्य
विश्वास की ऊष्मा को बनाए रखे,
और साथ ही
विवेक की ज्योति को भी प्रज्वलित रखे।
तब
उसकी चेतना
न केवल सत्य के निकट पहुँचती है,
बल्कि
जीवन के गहरे अर्थ को भी
समझने लगती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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