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Saturday, 7 March 2026

बिना चेहरे का आदमी

 बिना चेहरे का आदमी

शहर की भीड़ में
मैंने एक आदमी देखा—
अजीब-सा, ख़ामोश-सा,
जिसका कोई चेहरा नहीं था।
न आँखें,
जिनमें ख़्वाब उतरते,
न होंठ,
जहाँ से इकरार या इंकार जन्म लेते।
बस एक चलता हुआ जिस्म था
और उसके चारों तरफ
तजुर्बों की धूल तैर रही थी।
पहले मुझे लगा
शायद वो किसी हादसे का शिकार है
या वक़्त की तेज़ आँधियों ने
उसका चेहरा उड़ा दिया है।
मगर फिर धीरे-धीरे
मेरी समझ में आया
चेहरा तो दरअसल
वो आईना होता है
जिसमें आदमी
अपने होने की तस्दीक़ करता है।
और जब
समाज तुम्हें
बार-बार
अपने साँचे में ढालने लगे,
तुम्हारी आवाज़ से पहले
तुम्हारा परिचय लिख दे,
तो आदमी
अपना असली चेहरा
कहीं भीतर तहख़ाने में रख देता है।
वही आदमी
आज मेरे सामने था।
उसके पास
हज़ारों नाम थे
मुलाज़िम, नागरिक, उपभोक्ता,
मतदाता, आंकड़ा,
और कभी-कभी
“किसी सिस्टम का हिस्सा।”
मगर
इन सब नामों के नीचे
उसका असली चेहरा
कहीं गुम था।
मैंने उससे पूछा
“तुम्हारा चेहरा कहाँ है?”
वो कुछ देर चुप रहा,
फिर हवा में उँगली से
एक अजीब-सा नक़्श खींचते हुए बोला
“मैंने उसे
बचपन की किसी अलमारी में
छुपा दिया था,
जब पहली बार
मुझसे कहा गया था
‘ऐसे मत सोचो।’”
फिर कहा गया
“ऐसे मत बोलो।”
और फिर—
“ऐसे मत जियो।”
धीरे-धीरे
हर मनाही ने
मेरे चेहरे का एक हिस्सा
छीन लिया।
अब
मैं बिना चेहरे का आदमी हूँ—
मगर
सच पूछो तो
मैं अकेला नहीं हूँ।
इस शहर में
चलते-फिरते
हज़ारों लोग मिलेंगे तुम्हें
जो बोलते हैं
मगर उनकी आवाज़
उनकी नहीं होती,
जो मुस्कुराते हैं
मगर मुस्कान
किसी और की लिखी होती है।
मैंने गौर से देखा—
भीड़ में
कई चेहरों के पीछे
ख़ालीपन की वही सूरत थी।
तब मुझे लगा
असल में
बिना चेहरे का आदमी
कोई एक शख़्स नहीं,
बल्कि
हमारी सभ्यता का
सबसे ईमानदार आईना है।
क्योंकि
चेहरे खोना
अक्सर
ज़िंदा रहने की
सबसे बड़ी कीमत होती है।
और शायद
इंसान की सबसे बड़ी जद्दोजहद भी यही है
कि एक दिन
वो फिर से
अपना असली चेहरा
ढूँढ ले।

" मुक़ाबिल में खड़ी दुनिया से ज़्यादा,
कभी-कभी आदमी को
अपने ही खोए हुए चेहरे से लड़ना पड़ता है।"
मुकेश ,,,,,,,,,

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