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Thursday, 5 March 2026

चेतना के किनारे बैठा प्रेम

 चेतना के किनारे बैठा प्रेम


चेतना

एक विशाल नदी है

जिसमें विचार

लहरों की तरह उठते हैं,

और स्मृतियाँ

धीरे-धीरे बहती रहती हैं।


मैं अक्सर

उस नदी के किनारे बैठकर

अपने ही मन को देखता हूँ—

कैसे एक विचार

दूसरे में बदल जाता है,

कैसे एक प्रश्न

दूसरे प्रश्न को जन्म देता है।


पर उसी किनारे

कभी-कभी

तुम आकर बैठ जाती हो।


और तब

लहरों का शोर

थोड़ा शांत हो जाता है।


तुम कुछ कहती नहीं,

बस

मेरे पास बैठी रहती हो

जैसे किसी गहरे ध्यान में

एक हल्की-सी रोशनी।


तुम्हारी उपस्थिति से

विचारों की गति धीमी पड़ जाती है,

और चेतना

अपनी ही गहराई को

थोड़ा और सुनने लगती है।


तब लगता है—

प्रेम

चेतना के भीतर नहीं,

उसके किनारे बैठा है।


वह विचार नहीं है,

पर विचारों को

अर्थ देता है।


वह शब्द नहीं है,

पर शब्दों के बीच

एक शांत विराम बन जाता है।


जब तुम पास होती हो

तो लगता है

मानो मन की नदी

समुद्र के करीब पहुँच गई हो।


और मैं समझने लगता हूँ

कि प्रेम

किसी तर्क का निष्कर्ष नहीं,

एक गहरी जागरूकता है।


वह बस

चेतना के किनारे बैठा

धीरे-धीरे मुस्कुराता है,


और हमें

अपने ही भीतर

थोड़ा और

गहरा बना देता है।


मुकेश ,,,,,,

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