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Saturday, 28 March 2026

शून्य की सीढ़ियों पर बैठा हुआ समय

 शून्य की सीढ़ियों पर बैठा हुआ समय


वहाँ

जहाँ कुछ भी नहीं है,

न शुरुआत,

न अंत,

न दिशा,

न कोई नाम


वहीं

कुछ सीढ़ियाँ उभरती हैं,

शून्य की…


न ऊपर जाती हुई,

न नीचे उतरती हुई,

बस

अस्तित्व के बीच

ठहरी हुई।


और उन पर

समय बैठा है,

थका हुआ,

जैसे अनंत यात्राओं के बाद

उसे पहली बार

कहीं रुकने का अवसर मिला हो।


समय

जो कभी रुकता नहीं,

जो सबको आगे धकेलता है,

आज

स्वयं

ठहर गया है।


मैं उसे देखता हूँ


उसकी आँखों में

कोई घड़ी नहीं,

कोई टिक-टिक नहीं,

बस

एक गहरी खामोशी,

जिसमें

सभी क्षण

घुल चुके हैं।


वह कहता नहीं,

पर उसकी चुप्पी

कुछ पूछती है


“जब कुछ भी नहीं है,

तो मैं क्यों हूँ?”


मैं उत्तर खोजता हूँ,

पर उत्तर भी

यहाँ आकर

अपना अर्थ खो देते हैं।


शून्य

कोई रिक्तता नहीं,

बल्कि

संभावनाओं का अनंत गर्भ है,


जहाँ हर घटना

जन्म लेने से पहले

एक विचार बनकर

रुक जाती है।


और समय

वहीं बैठा हुआ

उन विचारों को देखता है,


जैसे कोई वृद्ध

अपने ही अतीत को

दूर से निहार रहा हो।


वह जानता है

कि जो घटेगा,

वह पहले ही

शून्य में बीज बन चुका है।


फिर भी

वह चलता है,

क्योंकि चलना

उसकी प्रकृति है।


पर इस क्षण

वह नहीं चल रहा,

वह बस

बैठा है,


जैसे उसने

अपने ही नियमों को

क्षण भर के लिए

भूल दिया हो।


मैं उसके पास बैठता हूँ


और पहली बार

महसूस करता हूँ

कि समय

कोई बाहरी शक्ति नहीं,


वह

मेरे ही अनुभवों का

एक क्रम है।


जब मैं भागता हूँ,

वह दौड़ता है।

जब मैं रुकता हूँ,

वह ठहर जाता है।


और जब मैं

पूरी तरह

शून्य में उतर जाता हूँ


वह

अपना अस्तित्व

खो देता है।


सीढ़ियाँ अब

सीढ़ियाँ नहीं रहीं,

वे

एक ही बिंदु में

सिमट गई हैं।


जहाँ न ऊपर है,

न नीचे

सिर्फ़

होना है।


और समय

जो अभी तक

उन पर बैठा था,


धीरे-धीरे

उस शून्य में

विलीन हो जाता है।


अब न प्रतीक्षा है,

न स्मृति,

न कोई अगला क्षण


बस

एक निरंतर

अदृश्य वर्तमान।


शायद यही

समय का अंतिम सत्य है,


कि वह

स्वयं भी

शून्य की सीढ़ियों पर

क्षण भर का यात्री है।


और शून्य

वह कहीं नहीं जाता,

वह तो सदा

वहीं रहता है


जहाँ सब कुछ

आकर

अपने अर्थ छोड़ देता है।


मुकेश ,,,,,,

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