अपराजिता के फूल और तुम
अपराजिता के फूल
जब सुबह की हल्की धूप में
धीरे-धीरे खुलते हैं,
तो लगता है
जैसे किसी ने
आसमान का नीला टुकड़ा
धरती पर टाँक दिया हो।
उनकी नाज़ुक पंखुड़ियों में
एक अजीब-सी शांति होती है
न कोई शोर,
न कोई प्रदर्शन,
बस चुपचाप
अपनी सुंदरता में
डूबे हुए।
तुम भी कुछ वैसे ही हो।
तुम्हारी उपस्थिति
किसी इत्र की तरह नहीं
जो दूर से ही पहचान ली जाए,
बल्कि उस हल्की हवा की तरह है
जो गुज़र तो जाती है
पर अपनी ठंडक
मन में छोड़ जाती है।
अपराजिता का फूल
कभी घमंड नहीं करता
कि वह कितना सुंदर है,
वह बस
लता पर झूलता रहता है
और आकाश से
एक गहरा रिश्ता बनाए रखता है।
और तुम
शायद इसी लिए
मुझे अपराजिता की याद दिलाते हो,
क्योंकि तुममें भी
एक ऐसी ही ख़ामोश ताक़त है
जो हारना नहीं जानती।
शायद इसीलिए
इन फूलों का नाम
अपराजिता है।
क्योंकि कुछ सुंदरताएँ
कभी पराजित नहीं होतीं
न समय से,
न दूरी से,
न स्मृतियों से।
मुकेश ,,,,,
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