सत्य की खोज में मनुष्य
जब मनुष्य ने
पहली बार आकाश की ओर देखा,
तो उसकी आँखों में
सिर्फ़ तारे नहीं थे
एक प्रश्न भी था।
वह प्रश्न
इतना पुराना है
जितना समय की पहली सुबह
सत्य क्या है?
धरती की धूल से उठकर
मनुष्य ने
अनगिनत रास्ते तय किए।
कभी
उसने अग्नि खोजी,
कभी पहिया,
कभी
ब्रह्मांड के रहस्य।
मगर
हर खोज के पीछे
एक ही प्यास थी
सत्य को जानने की प्यास।
कभी वह
ऋषियों की तपस्या में दिखाई देता है,
कभी
दार्शनिकों के तर्क में,
कभी
वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में।
मनुष्य
अजीब यात्री है
वह
दुनिया को समझने के लिए
पहाड़ों पर चढ़ता है,
समुद्रों को पार करता है,
और
कभी-कभी
अपने ही भीतर उतर जाता है।
क्योंकि
सत्य केवल बाहर नहीं,
भीतर भी छिपा है।
इतिहास की लंबी यात्रा में
कई लोगों ने कहा
“हमें सत्य मिल गया।”
पर समय ने
हर बार धीरे से बताया
सत्य
किसी एक हाथ में नहीं ठहरता।
वह
हर युग में
नए रूप में सामने आता है।
एक समय
धरती को स्थिर माना गया,
फिर पता चला
कि वह भी आकाश में घूम रही है।
एक समय
मनुष्य ने सोचा
कि वह सृष्टि का केंद्र है,
फिर उसे समझ आया
कि वह
अनंत ब्रह्मांड का
सिर्फ़ एक छोटा-सा यात्री है।
पर यही तो
सत्य की खोज का सौंदर्य है
जितना मनुष्य जानता है,
उतना ही
उसे अपनी अज्ञानता का बोध होता है।
और शायद
यही बोध
उसे विनम्र बनाता है।
सत्य
कोई पत्थर की मूर्ति नहीं
जिसे एक बार पा लिया जाए।
वह तो
एक जीवित यात्रा है
जो प्रश्नों से शुरू होती है
और
समझ की नई परतों तक पहुँचती है।
मनुष्य
जब तक प्रश्न पूछता रहेगा,
तब तक
सत्य की यह यात्रा भी जारी रहेगी।
क्योंकि
सत्य की खोज में
चलता हुआ मनुष्य
सिर्फ़ ब्रह्मांड को नहीं समझता
वह धीरे-धीरे
खुद को भी पहचानने लगता है।
और शायद
सत्य का सबसे गहरा रूप
यही है
कि खोजते-खोजते
मनुष्य
अपने ही अस्तित्व का
एक नया अर्थ पा ले।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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