जब आईना रूह दिखाने लगा
एक दिन
मैंने आईने में देखा
मगर चेहरा
वैसा नहीं था
जैसा हर रोज़ दिखाई देता था।
आँखों के पीछे
कोई और गहराई थी,
जैसे कोई पुराना राज़
धीरे-धीरे खुल रहा हो।
मैंने सोचा
ये वही आईना है
जो हमेशा
बस मेरा चेहरा दिखाता था।
मगर उस दिन
उसकी सतह के पार
एक और दुनिया थी—
ख़ामोश, उजली
और बहुत गहरी।
वहाँ
न उम्र थी
न नाम,
बस एक रौशनी थी
जो रूह की तरह
मेरे अंदर जल रही थी।
तब समझ में आया
कि आईना
सिर्फ़ चेहरा नहीं दिखाता,
वो उस वक़्त
रूह भी दिखाने लगता है
जब इंसान
अपने अहंकार की धूल
धो देता है।
उस दिन
आईना मेरे सामने नहीं था,
वो तो
मेरे अंदर खड़ा था।
और मैं
पहली बार
अपने असली वजूद से
मुलाक़ात कर रहा था।
मुकेश ,,,,,,,,,
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