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Friday, 6 March 2026

डहलिया — रंगों का वनस्पति-शास्त्र

 डहलिया — रंगों का वनस्पति-शास्त्र

धरती की प्रयोगशाला में

एक फूल उगता है

नाम है डहलिया,

पर यह केवल फूल नहीं,

प्रकृति की एक सूक्ष्म शोध-पांडुलिपि है।


इसके बीज में छुपा होता है

विकास का एक प्राचीन सूत्र,

जहाँ कोशिकाएँ

ज्यामिति की भाषा में

पंखुड़ियों का विन्यास रचती हैं।


हर पंखुड़ी

जैसे किसी वैज्ञानिक की नोटबुक में

खींची हुई सर्पिल रेखा हो—

फाइबोनाची के मौन गणित में

संतुलित होती हुई।


वनस्पति विज्ञान कहता है

यह एस्टेरेसी कुल का सदस्य है,

मेक्सिको की मिट्टी से उठा

और पृथ्वी के बाग़ों में फैल गया,

जैसे रंगों का कोई प्रवासी सिद्धांत।


पर शोध केवल प्रयोगशालाओं में नहीं होता—

कभी-कभी

एक माली की हथेली पर भी

विज्ञान का फूल खिलता है।


जब वह मिट्टी को पलटता है,

जल देता है,

और धूप को

धीरे से पौधे तक पहुँचने देता है

तब वह अनजाने में

प्रकृति के सबसे पुराने प्रयोग को दोहराता है।


डहलिया के रंग

लाल, पीले, बैंगनी, सफ़ेद

मानो प्रकाश के स्पेक्ट्रम की

जीवित व्याख्या हों।


और तब समझ में आता है

कि एक फूल

सिर्फ़ सुंदरता नहीं होता

वह जीवविज्ञान का एक खुला सूत्र है,

रंगों की रसायनशाला है,

और धरती के धैर्य का

सबसे कोमल प्रमाण।


इसलिए

जब अगली बार डहलिया खिले

उसे केवल देखना मत,

थोड़ा पढ़ना भी…


क्योंकि उसकी पंखुड़ियों में

प्रकृति ने

अपना सबसे रंगीन शोधपत्र

चुपचाप प्रकाशित किया है


मुकेश ,,,,,,,

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