सनग्लासेस के पीछे छुपी हुई शरारत
सनग्लासेस के पीछे
तुम्हारी आँखें क्या सोचती हैं
यह राज़
सूरज भी नहीं जान पाता।
काले शीशों की ओट में
एक चमक छुपी रहती है,
जैसे दो चिंगारियाँ
जान-बूझकर पर्दा किए बैठी हों।
तुम सामने से गुज़रती हो
और दुनिया समझती है
तुम बस यूँ ही निकली हो;
पर मैं जानता हूँ,
उन लेंसों के पीछे
एक मुस्कुराती साज़िश पल रही है।
जब तुम हल्का-सा
फ्रेम को उँगलियों से ऊपर सरकाती हो,
तो एक पल को
वो शरारत झाँक लेती है
और फिर तुरंत
खुद को छुपा भी लेती है।
तुम्हारे सनग्लासेस
सिर्फ़ धूप नहीं रोकते,
वे तुम्हारी आँखों की
अनकही बातें भी
बचाकर रखते हैं।
और सच कहूँ
उस छुपी हुई शरारत में
एक अलग ही नशा है;
क्योंकि जो पूरी तरह दिख जाए
वो आकर्षण नहीं रहता
पर जो आधा छुपा हो,
वही दिल को
सबसे ज़्यादा बेचैन करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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