मन और ब्रह्म का संबंध
जब मनुष्य
पहली बार अपने भीतर उतरा,
तो उसे वहाँ
एक हलचल मिली
विचारों की,
स्मृतियों की,
कल्पनाओं की।
वही हलचल
मन थी।
मन
जो कभी नदी की तरह बहता है,
कभी हवा की तरह भटकता है,
और कभी
एक प्रश्न बनकर
अनंत आकाश की ओर उठ जाता है।
पर उसी क्षण
एक और रहस्य सामने आता है
अगर मन
इतना सीमित है,
तो उसे
अनंत की कल्पना कैसे होती है?
यहीं से
ब्रह्म का विचार जन्म लेता है।
ब्रह्म
न रूप, न सीमा,
न आरंभ, न अंत।
वह
समस्त अस्तित्व का
मौन विस्तार है।
मन
उस विस्तार को
समझने की कोशिश करता है
शब्दों में,
तर्कों में,
और ध्यान की गहराइयों में।
पर हर बार
वह एक सीमा पर आकर ठहर जाता है।
जैसे कोई नदी
समुद्र के सामने
अपनी धारा धीमी कर दे।
क्योंकि
मन सीमित है,
और ब्रह्म
अनंत।
फिर भी
इन दोनों के बीच
एक अद्भुत रिश्ता है।
मन
ब्रह्म को पूरी तरह पकड़ नहीं सकता,
पर उसकी झलक
महसूस कर सकता है।
कभी
किसी गहरे ध्यान में,
कभी
किसी प्रेम की शुद्ध अनुभूति में,
और कभी
उस मौन क्षण में
जब विचार थक जाते हैं।
तभी
मन धीरे से समझता है
वह केवल
एक दर्पण है।
और ब्रह्म
वह आकाश है
जो उस दर्पण में झलकता है।
ऋषियों ने कहा
जब मन शांत हो जाता है,
तो उसकी तरंगें थम जाती हैं।
और तब
ब्रह्म की झलक
स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
जैसे
स्थिर झील में
आकाश का पूरा प्रतिबिंब उतर आता है।
शायद
मन और ब्रह्म का संबंध
यही है
मन
एक प्रश्न है,
और ब्रह्म
उस प्रश्न की अनंत संभावना।
जब मन
अपने ही शोर से मुक्त हो जाता है,
तब वह समझने लगता है
कि वह अलग नहीं,
बल्कि
उसी अनंत चेतना का
एक छोटा-सा स्पंदन है।
और उसी क्षण
मन की यात्रा
ब्रह्म की शांति में
धीरे से विलीन हो जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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