अंदर बैठा हुआ मुसाफ़िर
मेरे अंदर
एक मुसाफ़िर बैठा हुआ है—
चुप,
ख़ामोश,
मगर हमेशा जागता हुआ।
वो कहीं जाता नहीं,
मगर उसका सफ़र
कभी ख़त्म भी नहीं होता।
मैंने दुनिया के रास्तों पर
बहुत चलना सीखा,
शहर बदले,
चेहरे बदले,
मगर वो मुसाफ़िर
वहीं बैठा रहा।
कभी-कभी
जब रात बहुत गहरी हो जाती है
और तन्हाई
दिल के पास आकर बैठती है—
तब
वो मुसाफ़िर
धीरे से आँखें खोलता है।
उसकी आँखों में
रास्तों की धूल नहीं,
बल्कि
एक अजीब-सी रौशनी होती है।
वो मुझसे कहता है—
“जिस मंज़िल को तू बाहर ढूँढ़ रहा है
वो तेरे अंदर ही है।”
मैं चुप हो जाता हूँ,
क्योंकि उसकी बात में
एक ऐसी सच्चाई होती है
जिससे भागा नहीं जा सकता।
मेरे अंदर
बैठा हुआ वो मुसाफ़िर
हर दिन
मुझे थोड़ा-थोड़ा
अपने पास बुलाता है—
ताकि एक दिन
मैं समझ सकूँ
कि असली सफ़र
पैरों से नहीं,
रूह से तय होता है।
मुकेश्,,,
No comments:
Post a Comment