जब आँखें बंद होती हैं
दृश्य मरने लगते हैं
धीरे-धीरे
जैसे रोशनी
अपना सामान समेट रही हो
हम आँखें बंद करते हैं
तो सिर्फ अँधेरा नहीं आता
आते हैं अधूरे चेहरे
अधूरे रास्ते
और कुछ ऐसे दृश्य
जो कभी पूरे नहीं हुए
दुनिया वहीं रहती है
पेड़
सड़कें
लोग
सब अपनी जगह
लेकिन
हमारे लिए
वे सब
थोड़ा-थोड़ा खत्म होने लगते हैं
देखना
सिर्फ आँखों का काम नहीं है
यह
यादों और विश्वास का भी काम है
और जब आँखें बंद होती हैं
तो विश्वास
धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है
एक आदमी
जब सच से आँखें बंद करता है
तो सच
मरने नहीं लगता
लेकिन
उसके भीतर
सच की जगह
कम होने लगती है
हम जितना कम देखते हैं
उतना कम समझते हैं
और जितना कम समझते हैं
उतना ज़्यादा डरते हैं
आँखें बंद करना
कभी-कभी आराम होता है
लेकिन
हर बार
आराम नहीं होता
कभी-कभी
यह
दृश्यों की हत्या भी होती है
फिर भी
हर बंद आँख के भीतर
एक छोटी-सी रोशनी
जिंदा रहती है
वह
सपनों की तरह
धीरे-धीरे
नई तस्वीरें बनाती है
और जब आँखें खुलती हैं
तो कुछ पुराने दृश्य
वापस नहीं आते
लेकिन
कुछ नए दृश्य
पहली बार
जन्म लेते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment