होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 14 April 2026

हाँ! शान्ति...

हाँ! शान्ति...

चौराहे पर देखी है उसे

बाल बिखेरे,

हाथ में डंडा,

हँसती हुई

या शायद रोती हुई हँसी में।

पहचान नहीं पाया पहले

बहुत बदल गई थी वह,

या शायद

हमने कभी उसे ठीक से देखा ही नहीं था।


याद है मुझे—

वही शान्ति

जो गली के आख़िरी मोड़ पर

चूने से पुते, टूटते घर में रहती थी।

काली थी,

बदसूरत कही जाती थी,

और गरीब तो जैसे

उसकी त्वचा में ही लिख दिया गया था।

हम उसे नाम से नहीं,

विशेषणों से बुलाते थे

“अरे वही…”

और वह

बस मुस्कुरा देती थी

या शायद

वह मुस्कान नहीं,

आदत थी।


मुहल्ले के हर लौंडे की नजर

उस पर टिकती थी

हँसी में,

सीटी में,

या गंदी फुसफुसाहट में।

कुछ अधपगले थे,

कुछ रसूख वाले,

कुछ सिर्फ बीमार

और कुछ हम जैसे

जो चुप रहते थे।

हाँ,

हम सब शामिल थे।


शान्ति कोई देह नहीं थी

पर हमने उसे

देह बना दिया।

वह कोई इच्छा नहीं थी

पर हमने उसे

भोग की वस्तु बना दिया।

और फिर

धीरे-धीरे

उसके भीतर का मन

घिसता गया…


एक दिन सुना

शादी हो गई उसकी।

एक शराबी,

एक थरकी के साथ

जिसकी नजर

उसके घर पर थी,

उस पर नहीं।

कुछ दिन बाद

घर उसका नहीं रहा

और शान्ति भी

कहीं की नहीं रही।


फिर वह दिखी—

किसी और के साथ।

रखैल…

यह शब्द हमने सीखा

उसी से।

वह मारी गई,

पीटी गई,

घिसी गई

जैसे कोई पुराना बर्तन

जिसे कोई फेंकने से पहले

पूरा इस्तेमाल कर लेना चाहता हो।


फिर एक दिन

वह पागल हो गई।

या शायद

वह पहली बार

सच में होश में आई थी।


अब वह चौराहे पर है

डंडा लेकर,

गालियाँ बकती हुई,

हँसती हुई

उस भयानक हँसी में

पूरा मुहल्ला काँप जाता है।

रात के सन्नाटे में

जब उसकी आवाज गूँजती है

तो लगता है

जैसे हमारी आत्मा पर

कोई खरोंच पड़ रही हो।


पुलिस आती है

उसे पीटती है,

भगा देती है

और फिर

मुहल्ले में

फिर से “शान्ति”

कायम हो जाती है।


हम चैन से सो जाते हैं।


हाँ! शान्ति…

तुम पागल नहीं थीं—

पागल तो हम थे।

तुम गंदी नहीं थीं—

गंदगी हमारी नजरों में थी।

तुम टूटी नहीं थीं—

हमने तुम्हें तोड़ा था।


और आज

जब तुम चौराहे पर खड़ी

हँसती हो—

तो लगता है

तुम हम पर नहीं,

हमारे समाज पर हँस रही हो।


हाँ…

अगर शान्ति “अशान्ति” है

तो शान्ति हम थे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment