पप्पू नेता…
(एक छुटभैया राजनीतिक पार्टी का मामूली कार्य करता )
पप्पू नेता…
चौराहे की उस दीवार पर
आज भी चिपका है तुम्हारा पसीना
पोस्टर के गोंद में मिला हुआ,
सूखकर भी
छूटता नहीं।
तुम्हें पहली बार देखा था
हाथ में ब्रश,
कंधे पर बाल्टी,
और आँखों में
एक अजीब-सी चमक।
तुम नेता नहीं थे
पर “नेता” कहलाना
तुम्हें अच्छा लगता था।
रात-रात भर
तुम दीवारों पर
चेहरे चिपकाते थे
किसी और के।
सुबह होते-होते
पूरा शहर
किसी और का हो जाता था
और तुम
फिर भी अपने ही मोहल्ले में
अजनबी बने रहते थे।
नारे तुम्हारे थे
आवाज़ तुम्हारी थी
पर शब्द
किसी और के।
“ज़िंदाबाद!”
तुम चिल्लाते थे
और जिंदाबाद
किसी और का हो जाता था।
रैलियों में
सबसे आगे दौड़ते हुए
तुम्हें देखा है
लाठी भी पहले
तुम पर ही पड़ी थी,
और फोटो में
नेता जी मुस्कुरा रहे थे।
तुम्हारे घर की दीवार पर
अब भी
एक कैलेंडर टंगा है
जिसमें नेता जी के साथ
तुम्हारी एक धुंधली-सी फोटो है।
तुम हर आने वाले को दिखाते हो
“ये देखो, मैं भी साथ था…”
जैसे वह फोटो
तुम्हारी जिंदगी की
सबसे बड़ी उपलब्धि हो।
हाँ,
हम भी हँसे थे तुम पर
“अरे पप्पू, तुझे क्या मिलेगा?”
और तुम हँसकर कहते थे
“देख लेना, एक दिन…”
वह “एक दिन”
कभी नहीं आया।
चुनाव आए
तुमने पोस्टर लगाए,
झंडे बाँधे,
भीड़ जुटाई
और जीत के बाद
तुम्हारा फोन
कभी नहीं उठा।
तुम दरवाज़े पर खड़े रहे
अंदर कुर्सियाँ भर गई थीं।
तुम्हारे लिए
कोई जगह नहीं बची थी।
पप्पू नेता…
तुम्हें इस्तेमाल किया गया
और तुम
खुश थे इस्तेमाल होकर।
क्योंकि तुम्हें लगता था
यही रास्ता है
“ऊपर” जाने का।
पर असल में
तुम सीढ़ी थे
जिस पर चढ़कर
कोई और ऊपर गया।
और सीढ़ियाँ
कभी ऊपर नहीं जातीं।
आज भी
तुम किसी पोस्टर के पीछे
खड़े हो
चेहरा ढका हुआ,
नाम गायब
पर आवाज़ वही
“ज़िंदाबाद!”
हाँ…
अगर राजनीति
सेवा है
तो सेवक तुम थे।
अगर राजनीति
सत्ता है
तो सत्ता
कभी तुम्हारी नहीं थी।
और सच कहूँ
नेता तुम नहीं थे,
पप्पू…
नेता तो
हम सब हैं
जो तुम्हें देखकर भी
कुछ नहीं बदलते।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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