शीश उतारे भुईं धरे— निर्गुण स्वर में एक नज़्म
शीश उतारे भुईं धरे
तभी तो भीतर
दरवाज़ा खुलेगा,
जब सिर
जो सोचता है,
जो तौलता है,
जो हर चीज़ पर
अपना नाम लिखता है
धीरे-धीरे
ज़मीन पर रख दिया जाए।
यह सिर
मांस का नहीं,
अहं का है—
जिसे उठाए-उठाए
हमने
हर रिश्ते को
भारी कर दिया।
कहते हैं
कबीर ने
“शीश उतारे भुईं धरे…”
पर यह कोई बलिदान नहीं,
एक हल्कापन है
जैसे
कंधों से उतर जाए
वो बोझ
जिसे हम
अपनी पहचान समझ बैठे थे।
जब
तुम अपना सिर रख दोगे
तो देखोगे
कि आँखें
पहली बार
बिना देखने के
देखने लगती हैं।
वहाँ
न ऊपर बचता है,
न नीचे
बस
एक समतल-सी शांति,
जहाँ
तुम नहीं होते,
और
सब कुछ
पहली बार
तुम्हारा हो जाता है।
शीश उतारे
तो डर भी उतरता है,
इच्छाएँ भी,
और
वो आवाज़ भी
जो हर वक़्त
खुद को साबित करती रहती है।
भुईं धरे
तो धरती
तुम्हें अपने जैसी
सहज बना लेती है
न ऊँचाई का घमंड,
न गिरने का भय।
और तब
तुम समझते हो,
निर्गुण क्या है
वो
जो किसी रूप में नहीं,
पर हर रूप में है
वो
जो तुम्हारे होने से
नहीं बँधा,
पर
तुम्हारे मिटने से
खिल उठता है।
शीश उतारे भुईं धरे
यही साधना है,
यही राह,
यही घर…
जहाँ
कुछ भी लेकर नहीं जाना,
और
सब कुछ
वहीं मिल जाना है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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