तुम्हारी आहट और सूखे पत्तों की सरसराहट
तुम आती नहीं हो अब
पर जगहें
तुम्हारे आने का बहाना ढूँढ लेती हैं।
कमरे का दरवाज़ा
जब हल्का-सा हिलता है,
या खिड़की
अपने आप आधी खुल जाती है,
तो लगता है
किसी ने नहीं
किसी याद ने कदम रखा है।
तुम्हारी आहट
कभी साफ़ नहीं थी,
हमेशा
किसी और चीज़ में छुपकर आती थी
कपड़ों की हल्की-सी खसखस,
किताब के पन्ने का मुड़ना,
या फर्श पर
अचानक खिंचती हुई एक लकीर।
जैसे कोई
खुद को जाहिर नहीं करना चाहता,
बस
मौजूद रहना चाहता है।
सूखे पत्तों की सरसराहट…
वो आवाज़ नहीं होती,
वो एक संकेत होती है
कि कुछ
गिर चुका है,
और अब
अपने होने की आख़िरी खबर दे रहा है।
तुम्हारी आहट भी
वैसी ही थी
कुछ जो
पहले ही चला गया था,
पर फिर भी
पीछे मुड़कर
एक बार बताना चाहता था
कि वो कभी यहाँ था।
अजीब है,
अब जब तुम नहीं हो,
तो आवाज़ें बढ़ गई हैं।
हर कोना
कुछ न कुछ कहता है,
हर खामोशी में
एक हल्की-सी हरकत है
जैसे
सूखे पत्ते
बिना हवा के भी
खुद-ब-खुद हिल रहे हों।
मैं कई बार
पीछे मुड़कर देखता हूँ
कोई नहीं होता।
पर ये “कोई नहीं” भी
पूरी तरह खाली नहीं होता,
उसमें
तुम्हारी आहट का एक साया
रुका रहता है।
अब समझ में आता है
कुछ लोग
जाते नहीं,
बस
आवाज़ बन जाते हैं।
और तुम…
अब मेरे लिए
कोई चेहरा नहीं,
कोई नाम नहीं
बस
एक सरसराहट हो,
जो हर बार
ये याद दिलाती है
कि गिरने के बाद भी
कुछ देर तक
जीया जा सकता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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