असौ आदित्य-मण्डले पुरुषः…” — ‘पुरुष’ पद का शांकरार्थ निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
असौ आदित्य-मण्डले स्थितः व्याहृत्य-अवयवः पुरुषः,
पुरुष-आकारत्वात्।
पूर्णः वा अनेन— प्राणः॥१६॥
ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र में “योऽसावसौ पुरुषः” इस पद का आदि शंकराचार्य अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ प्रस्तुत करते हैं। यहाँ “पुरुष” कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक तत्त्व है— जो ब्रह्म के सगुण, उपास्य और साक्षात् अनुभवगम्य स्वरूप का द्योतक है।
“असौ आदित्य-मण्डले” — उपासना का आलम्बन
“असौ” (वह) और “आदित्य-मण्डले” —
यह संकेत करता है—
सूर्य में स्थित उस चेतन सत्ता की ओर
जो उपासना का आलम्बन है
यहाँ सूर्य—
केवल भौतिक पिण्ड नहीं,
बल्कि चैतन्य का प्रतीक है
“व्याहृत्य-अवयवः” — समष्टि-चेतना का स्वरूप
“व्याहृत्य-अवयव” का अर्थ—
वह जिसमें सम्पूर्ण जगत् (व्याहृतियाँ— भूर्, भुवः, स्वः आदि) अवयव के रूप में स्थित हैं
अर्थात्—
यह “पुरुष”
समष्टि (cosmic totality) का अधिष्ठाता है
यह—
हिरण्यगर्भ का स्वरूप है
“पुरुष-आकारत्वात्” — चेतन सत्ता का रूप
यहाँ “पुरुष” शब्द का कारण बताया गया है—
“पुरुष-आकारत्वात्”
अर्थात्—
वह चेतन सत्ता
जो अनुभव में “व्यक्ति-सदृश” प्रतीत होती है
यह आकार—
वास्तविक नहीं,
उपासना के लिए कल्पित (उपाधि) है
“पूर्णः वा” — सर्वव्यापकता का बोध
“पूर्ण” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—
जो सबमें व्याप्त है
जिसमें कुछ भी अभाव नहीं
यह—
ब्रह्म का लक्षण है
अतः—
यह “पुरुष”
सीमित नहीं,
बल्कि पूर्णता का प्रतीक है
“अनेन प्राणः” — जीवन-शक्ति का आधार
यहाँ संकेत है—
उसी “पुरुष” से
प्राण (जीवन-शक्ति) संचालित होती है
अर्थात्—
वह चेतना
समस्त जीवों के जीवन का आधार है
दार्शनिक गहराई
यह भाष्यांश यह स्पष्ट करता है कि—
“पुरुष” कोई देहधारी व्यक्ति नहीं,
बल्कि एक दार्शनिक प्रतीक है—
समष्टि-चेतना
प्राण का स्रोत
उपासना का केन्द्र
उपासना और ज्ञान का सेतु
यहाँ “पुरुष” की कल्पना—
उपासना के लिए है
किन्तु—
इसका उद्देश्य साधक को
अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाना है
अतः—
पहले → “वह पुरुष”
अंत में → “सोऽहमस्मि”
दृष्टांत
जैसे—
कोई विद्यार्थी पहले मानचित्र (map) के माध्यम से स्थान को समझता है,
फिर वास्तविक स्थान तक पहुँचता है—
उसी प्रकार—
“पुरुष” एक मानचित्र है
ब्रह्म की ओर ले जाने वाला
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—
“पुरुष” = समष्टि-चेतना
“आदित्य-मण्डल” = उपासना का आलम्बन
“पूर्ण” = ब्रह्म का लक्षण
अतः—
यह ‘पुरुष’ उपासना का विषय होते हुए भी
अंततः साधक को उसके अपने आत्मस्वरूप तक ले जाता है।
यही—
“सोऽहमस्मि” की अनुभूति का आधार है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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