बंद दरवाज़ा
दरवाज़ा हमेशा लकड़ी का नहीं होता,
कभी वह चुप्पियों से बना होता है,
कभी एक अधूरी बात से,
कभी उस नज़र से
जो लौटकर कभी आई ही नहीं।
मेरे कमरे में एक दरवाज़ा है
पुराना, हल्का-सा टेढ़ा,
जिसकी कुंडी हर बार बंद करते हुए
एक अजीब-सी आवाज़ करती है,
जैसे कोई भीतर से
धीरे-धीरे विरोध कर रहा हो।
मैंने उसे कई बार खोला है
बाहर जाने के लिए नहीं,
बल्कि यह देखने के लिए
कि क्या सचमुच बाहर कुछ है
या सिर्फ़ एक और दरवाज़ा।
कभी-कभी लगता है
हम दरवाज़े नहीं खोलते,
हम बस अपने भीतर के कमरों को
थोड़ा-थोड़ा उजाला देते हैं।
और फिर एक दिन
हम उसी दरवाज़े के सामने खड़े होते हैं
जिसे हमने खुद बनाया था
डर से, स्मृतियों से,
और थोड़ी-सी उम्मीद से भी।
वह दरवाज़ा बंद है,
पर पूरी तरह नहीं
उसकी दरारों से
एक हल्की-सी रोशनी आती है।
शायद
हर बंद दरवाज़ा
पूरी तरह बंद नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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