कुछ लोग धीरे-धीरे एक लाइब्रेरी में बदल जाते हैं
कुछ लोग
ज़िन्दगी के शोर से नहीं भागते।
वे बस
धीरे-धीरे कम बोलने लगते हैं।
फिर
कम याद रखने लगते हैं।
और फिर
बस यादों को सँभालने लगते हैं।
उनके भीतर
किताबों जैसी व्यवस्था बनने लगती है।
हर अनुभव
एक अलग अलमारी में रख दिया जाता है।
हर दर्द
एक धूल भरी जिल्द में बदल जाता है।
हर प्रेम
किसी पुराने पन्ने के किनारे
हल्के से अटका रह जाता है।
ऐसे लोग
बाहर से साधारण दिखते हैं।
मगर अगर पास बैठो
तो महसूस होता है—
उनकी ख़ामोशी में
किसी रूसी कहानी की ठंडक है।
उनकी मुस्कुराहट में
किसी भूले हुए उपन्यास का अधूरा अध्याय।
और उनकी आँखों में
ऐसे वाक्य हैं
जो कभी लिखे नहीं गए।
समय के साथ
वे लोगों से कम
किताबों से ज़्यादा बात करने लगते हैं।
और धीरे-धीरे
उनकी आवाज़
पन्ने पलटने जैसी हो जाती है।
उनका ग़ुस्सा
अंडरलाइन बन जाता है।
उनकी उदासी
हाशियों में लिखी टिप्पणी।
और उनकी ख़ुशी
किसी दुर्लभ किताब की तरह
कम लोगों तक पहुँचती है।
फिर एक दिन
वे किताबें उठाना बंद कर देते हैं।
क्योंकि अब
वे खुद किताबों की तरह
रख दिए जाते हैं।
किसी अलमारी में नहीं—
लोगों की यादों में।
और जो उन्हें जानता है
वह धीरे-धीरे समझता है
कुछ लोग मरते नहीं।
वे बस
एक धीमी, पुरानी लाइब्रेरी बन जाते हैं
जो बंद आँखों के भीतर
अब भी खुली रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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