हाथ धोने वाली स्त्री
अब जब भी मैं किसी को बिना सोचे दरवाज़े का हैंडल पकड़ते देखता हूँ, मुझे उसकी याद आ जाती है।
या कई बार केवल साबुन की गन्ध से भी।
कुछ गन्धें स्मृति के भीतर बहुत गहरे उतर जाती हैं। जैसे वे केवल नाक से नहीं, पूरे तंत्रिका-तंत्र से महसूस होती हों।
उसके घर में हमेशा साबुन, फिनाइल, डिटॉल और धुले हुए कपड़ों की मिली-जुली गन्ध रहती थी। इतनी तीखी कि कुछ देर बाद सिर भारी होने लगता।
वह रिश्ते में मेरी चाची लगती थी।
हालाँकि सच यह है कि अब परिवार में शायद ही कोई उन्हें उनके नाम से याद करता हो। किसी के लिए वे चाची थीं, किसी के लिए बुआ, किसी के लिए माँ, किसी के लिए बड़ी बहन। और शायद धीरे-धीरे वे स्वयं भी अपना नाम भूल चुकी थीं।
कभी-कभी बैंक के काग़ज़ों, अस्पताल की पर्ची या आधार कार्ड पर हस्ताक्षर करते समय उन्हें अपना नाम याद करना पड़ता था — जैसे वह भी अब उनकी स्थायी पहचान न रह गया हो, केवल एक सरकारी आवश्यकता भर हो।
लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था।
मुझे बचपन की धुँधली याद है — वे बहुत हँसती थीं। त्योहारों में सबसे ज़्यादा काम करतीं, बच्चों को खिलातीं, देर रात तक जागतीं। उनके हाथों में हमेशा हल्दी, आटे या साबुन की गन्ध रहती, लेकिन वह सामान्य घरेलू गन्ध थी, बीमारी की नहीं।
बीमारी बहुत धीरे शुरू हुई।
पहले उन्होंने बाहर से आने पर हाथ धोना शुरू किया। फिर बाज़ार का सामान धोने लगीं। फिर दरवाज़ों के हैंडल। फिर नोट। फिर दूध के पैकेट।
परिवार ने शुरू में इसे सफ़ाई पसंद स्वभाव समझा।
फिर एक समय आया जब घर में हर वस्तु दो हिस्सों में बँट गई — “साफ़” और “गन्दी।”
और गन्दी चीज़ों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई।
अब वे किसी भी दरवाज़े को सीधे हाथ से नहीं छूती थीं। चाहे वह घर का दरवाज़ा हो, फ्रिज का, अलमारी का या माइक्रोवेव का — वे पहले काग़ज़ का एक छोटा टुकड़ा निकालतीं, उससे हैंडल पकड़तीं, फिर उस काग़ज़ को तुरन्त फेंक देतीं।
उनकी उँगलियों की त्वचा लगातार धुलते-धुलते सफ़ेद और पतली हो गई थी। कई जगह दरारें पड़ गई थीं। लेकिन उन्हें अपने हाथों की चिन्ता नहीं थी।
उन्हें केवल संक्रमण का भय था।
एक अदृश्य, हर जगह फैला हुआ भय।
मैं कई वर्षों बाद एक दिन उनके घर गया।
दरवाज़ा उन्होंने देर से खोला। शायद पहले भीतर कुछ व्यवस्थित किया होगा।
अन्दर जाते ही वही परिचित तीखी सफ़ाई की गन्ध। फर्श चमक रहा था। मेज़ पर अख़बार सीधी रेखा में रखे थे। स्टील के बर्तन इतने चमकदार कि उनमें चेहरा दिख जाए।
लेकिन उस चमक में घर जैसी गर्मी नहीं थी।
सब कुछ ऐसा लगता था जैसे उपयोग के लिए नहीं, निरीक्षण के लिए रखा गया हो।
उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा, फिर तुरन्त सोफ़े पर एक साफ़ चादर बिछा दी।
“बाहर से आए हो,” उन्होंने धीरे से कहा।
उनकी आवाज़ में अब स्थायी थकान रहती थी।
मैंने देखा, बातचीत करते समय भी उनकी आँखें बार-बार उन जगहों पर चली जातीं जिन्हें मैंने छुआ था — दरवाज़ा, कुर्सी का हत्था, मेज़ का किनारा।
जैसे हर स्पर्श उनके भीतर कोई अलार्म बजा देता हो।
कुछ देर बाद वे चाय लाईं। कप रखते समय भी उन्होंने किनारे को रूमाल से पकड़ा।
फिर अचानक पूछा
“हाथ धोए थे न?”
मैंने कहा
“हाँ चाची।”
हालाँकि सच यह था कि मैंने केवल पानी से हाथ धोए थे।
उन्होंने मेरी ओर कुछ क्षण देखा। शायद उन्हें मेरे उत्तर पर पूरा विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बातचीत के बीच वे बार-बार उठतीं। कभी मेज़ पोंछतीं, कभी पहले से साफ़ प्लेट को फिर धोने ले जातीं, कभी बच्चों को डाँटतीं कि उन्होंने फ्रिज ठीक से बन्द नहीं किया।
घर के बाकी लोग अब इस सबके अभ्यस्त हो चुके थे।
उनके पति चुप रहने लगे थे। बेटा बाहर ज़्यादा समय बिताता। बहू की आँखों में लगातार थकी हुई चिड़चिड़ाहट रहती।
लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि चाची को लगता था वे सब लापरवाह हैं — केवल वही पूरे घर को बीमारी से बचाए हुए हैं।
एक बार उनकी बेटी ने गलती से धुले हुए बर्तनों को बिना हाथ धोए छू लिया।
चाची अचानक बहुत उत्तेजित हो गईं। वे लगातार बड़बड़ाने लगीं —
“किसी को समझ नहीं… सब गन्दा कर देते हो… फिर बीमारी होगी तो…”
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
उस क्षण मुझे पहली बार साफ़ महसूस हुआ कि यह केवल सफ़ाई की आदत नहीं थी।
यह भय था।
ऐसा भय जिसे वे तर्क से नियंत्रित नहीं कर पा रही थीं।
मनोविज्ञान की भाषा में इसे शायद “ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर” कहते हैं — वह अवस्था जिसमें दिमाग़ किसी एक आशंका को बार-बार पैदा करता है, और व्यक्ति उससे राहत पाने के लिए कुछ क्रियाएँ दोहराता रहता है। हाथ धोना। चीज़ें साफ़ करना। जाँचते रहना।
लेकिन बीमारी का नाम जान लेने से उसका दुःख कम नहीं होता।
मैंने एक दिन उनसे धीरे से कहा भी
“चाची, यह बीमारी है… इलाज हो सकता है…”
वे कुछ क्षण चुप रहीं। फिर हल्की नाराज़ मुस्कान के साथ बोलीं —
“तुम लोगों को सफ़ाई बीमारी लगती है।”
मैंने आगे कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कई मानसिक बीमारियों की सबसे बड़ी विडम्बना यही होती है — रोगी को अपना भय पूरी तरह वास्तविक लगता है।
समय बीतता गया।
अब सुनता हूँ, वे दिन में कई बार नहाती हैं। कपड़े अलग-अलग ढेरों में रखती हैं। अपने बिस्तर पर किसी को बैठने नहीं देतीं।
और सबसे दुखद बात यह है कि धीरे-धीरे उनका पूरा व्यक्तित्व उसी बीमारी में सिमटता जा रहा है।
अब परिवार में उनके बारे में बात होती है, तो लोग कहते हैं —
“उन्हें सफ़ाई का रोग है।”
मानो वे एक मनुष्य नहीं, केवल एक लक्षण रह गई हों।
लेकिन मुझे कभी-कभी उनका पुराना चेहरा याद आता है।
वही जो शायद अब उन्हें खुद भी याद नहीं।
और तब लगता है — मानसिक बीमारियाँ केवल आदतें नहीं बदलतीं, वे धीरे-धीरे मनुष्य और उसके सम्बन्धों के बीच की गर्मी भी खा जाती हैं।
अन्त में घर साफ़ रह जाता है।
लेकिन जीवन थोड़ा कम रहने योग्य हो जाता है।
MUKESH ,,,,,,,,,,,,,
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