बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)
रदीफ़: “हो रहे हैं”
क़ाफ़िया: पत्थर / ख़ंजर / मंजर / समंदर / बंजर
मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं,
तेरी ख़ामोशियों के वार ख़ंजर हो रहे हैं।
कभी जो ख़्वाब थे आँखों में रौशन चाँद जैसे,
वही अब वक़्त के हाथों से बंजर हो रहे हैं।
मिरी तन्हाइयों का दर्द क्या समझेगा कोई,
यहाँ चेहरे भी धीरे-धीरे पत्थर हो रहे हैं।
तेरी यादों की बारिश भी नहीं राहत बनी अब,
मिरे अंदर कई सूखे समंदर हो रहे हैं।
मैं अपने ज़ख़्म को लफ़्ज़ों में ढालूँ भी तो कैसे,
मिरे अशआर ही अब दर्द के मंजर हो रहे हैं।
ये कैसा दौर है जिसमें सभी रिश्ते थके से,
मोहब्बत के सभी चेहरे भी दफ़्तर हो रहे हैं।
मक़ता:
'मुकेश' इस शहर में एहसास ज़िंदा कम बचे हैं,
यहाँ इंसान भी जीते-जी पत्थर हो रहे हैं।
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