रात के उस हिस्से में, जहाँ शहर की आवाज़ें लगभग समाप्त हो जाती हैं, चीज़ों की अपनी एक धीमी भाषा खुलने लगती है।
लकड़ी सिकुड़ती है।
पुरानी अलमारी भीतर कहीं बहुत हल्की-सी कराहती है।
फ्रिज का कम्प्रेसर अचानक चल पड़ता है, फिर बंद हो जाता है।
और इन सबके बीच आदमी को पहली बार महसूस होता है कि घर कभी पूरी तरह निर्जीव नहीं होते।
वे सुनते रहते हैं।
वह अब भी खिड़की के पास बैठा था।
लेकिन अब उसके बैठने में प्रतीक्षा कम, थकान ज़्यादा थी।
कॉफ़ी का मग खाली हो चुका था।
फिर भी उसकी उँगलियाँ उसके हैंडल में फँसी थीं
जैसे हाथ किसी वस्तु को नहीं, समय के किसी अंतिम सिरा पकड़े हुए हों।
उसने बाहर देखा।
सामने वाली इमारत की तीसरी मंज़िल पर अब भी रोशनी जल रही थी।
परदे के पीछे किसी स्त्री की धुँधली आकृति आती-जाती दिखाई दे रही थी।
कभी वह रुकती, कभी झुकती, शायद मेज़ पर कुछ रखती।
उसे अचानक यह ख़याल आया कि हर रोशन खिड़की के पीछे कोई न कोई अपनी निजी उदासी के साथ जीवित है।
शहर दरअसल लाखों अकेले कमरों का समूह है।
दिन में लोग एक-दूसरे से टकराते हैं, बातें करते हैं, बाज़ारों में घूमते हैं, हँसते हैं
लेकिन रात में हर आदमी अंततः अपने कमरे और अपने भीतर लौट आता है।
और वहीं उसका असली जीवन उसका इंतज़ार कर रहा होता है।
उसने सिर थोड़ा मोड़ा।
दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर अँधेरे में आधी दिखाई दे रही थी।
उस तस्वीर में वह मुस्करा रही थी — वही हल्की, संयत मुस्कान, जिसमें स्नेह कम और समझ ज़्यादा होती थी।
उसे याद आया, मरने से कुछ महीने पहले वह बहुत चुप रहने लगी थी।
बीमारी शरीर में थी, लेकिन उसकी चुप्पी कहीं और से आती थी।
एक रात उसने अचानक पूछा था
“तुम मेरे बाद क्या करोगे?”
उसने तुरंत जवाब दिया था
“ऐसी बातें मत करो।”
लेकिन अब वर्षों बाद उसे लगता था, वह प्रश्न मृत्यु का नहीं था।
वह यह जानना चाहती थी कि उसके जाने के बाद इस आदमी का भीतर किस चीज़ से भरेगा।
और सच यह था —
कुछ भी नहीं भरा।
सिर्फ़ समय जमा होता गया।
धीरे-धीरे, परत-दर-परत।
जैसे पुराने घरों की दीवारों पर सीलन चढ़ती है।
उसे महसूस हुआ कि स्मृतियाँ कभी अचानक नहीं दुखातीं।
वे पहले आदमी के भीतर घर बनाती हैं।
फिर वहीं रहने लगती हैं।
और एक दिन वही घर आदमी को छोटा पड़ने लगता है।
उसने खिड़की थोड़ा खोली।
ठंडी हवा भीतर आई।
साथ में कहीं दूर से रातरानी की बहुत हल्की गंध।
वह गंध उसे हमेशा बेचैन करती थी।
क्योंकि कुछ सुगंधें वर्तमान की नहीं होतीं।
वे सीधे बीते हुए समय से आती हैं।
उसे अचानक एक पुरानी रात याद आई —
बरसात का मौसम था।
बिजली चली गई थी।
उसकी पत्नी मोमबत्ती की रोशनी में बाल सुखा रही थी।
कमरे में गीले बालों और रातरानी की मिली-जुली गंध थी।
वह किताब पढ़ने का अभिनय कर रहा था, लेकिन बार-बार उसे देख लेता था।
उस क्षण में कुछ असाधारण नहीं था।
और शायद इसी कारण वह स्मृति इतनी जीवित रह गई।
जीवन की सबसे गहरी यादें अक्सर बहुत मामूली क्षणों से बनती हैं।
कोई हँसी।
रसोई में बर्तनों की आवाज़।
साथ बैठे हुए बिना कुछ कहे चाय पीना।
प्रेम बड़े वाक्यों में नहीं रहता।
वह छोटी-छोटी आदतों में छिपा रहता है।
उसने आँखें मल लीं।
उम्र के साथ यादें साफ़ और वर्तमान धुँधला होने लगता है।
अब उसे कल क्या खाया था, यह याद नहीं रहता।
लेकिन तीस साल पहले की एक शाम की हवा तक याद थी।
बाहर अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई।
सड़क की बत्तियों में गिरती बूँदें ऐसे चमक रही थीं, जैसे अँधेरे पर किसी ने महीन सुइयाँ गिरा दी हों।
वह बहुत देर तक उन्हें देखता रहा।
फिर उसे लगा —
मनुष्य का जीवन शायद किसी नदी की तरह नहीं, बल्कि खिड़की पर गिरती बारिश जैसा है।
कुछ क्षण दिखाई देता है,
फिर धीरे-धीरे नीचे फिसल जाता है,
अपने पीछे सिर्फ़ एक पारदर्शी निशान छोड़कर।
कमरे में अब ठंड बढ़ गई थी।
लेकिन वह उठा नहीं।
उसके भीतर जैसे उठने की इच्छा धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।
उसे पहली बार समझ आया कि बुढ़ापा शरीर की कमजोरी नहीं है।
बुढ़ापा वह क्षण है, जब आदमी चीज़ों को बदलना बंद कर देता है।
वह उसी कुर्सी पर बैठा रहता है।
उसी खिड़की के सामने।
उसी स्मृति के भीतर।
और शायद एक दिन बिना किसी शोर के वहीं रह जाता है —
जैसे कोई दीपक पूरी रात जलने के बाद अचानक नहीं, बहुत धीरे-धीरे कम होता हुआ बुझता है।
बारिश अब थोड़ी तेज़ हो चुकी थी।
उसने मग को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
उसकी आँखें बाहर थीं।
लेकिन ऐसा लगता था, वह बाहर कुछ नहीं देख रहा।
वह अपने ही भीतर कहीं बहुत दूर चला गया था
और कहानी वहीं,
उस अधखुली खिड़की,
बारिश की गंध,
और हाथ में पकड़े खाली कॉफ़ी मग के साथ
धीरे-धीरे अँधेरे में घुलती चली गई।
मुकेश ,,,,,,,
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