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Saturday, 23 May 2026

अँधेरे में ली गई साँस

 अँधेरे में ली गई साँस

अब सोचता हूँ तो लगता है कि मनुष्य का शरीर अपने रहस्यों को मन से बहुत पहले जान लेता है।

मन देर से समझता है।

बहुत देर से।

लेकिन शरीर — वह किसी अजीब, प्राचीन पशु की तरह — पहले ही संकेत पकड़ लेता है।

उस समय मेरी उम्र वही थी जिसे लोग कच्ची उम्र कहते हैं। गले की हड्डियाँ उभरने लगी थीं। आवाज़ कभी भारी हो जाती, कभी अचानक पतली। होंठों के ऊपर महीन रोओं की एक धुँधली रेखा दिखाई देने लगी थी जिसे मैं आईने में कई कोणों से देखकर समझने की कोशिश करता कि क्या सचमुच मूँछ आ रही है या यह केवल मेरा भ्रम है।

मन हर समय अस्थिर रहता।

ज़रा-सी बात पर उदास हो जाना।

किसी के डाँट देने पर भीतर घंटों जलते रहना।

और जो थोड़ा प्रेम से बोल दे, उसके प्रति तुरंत नरम पड़ जाना।

उस उम्र में भीतर एक साथ आज्ञाकारिता और विद्रोह दोनों पलते हैं। बाहर से लड़का चुप दिखाई देता है, भीतर वह लगातार किसी अदृश्य दीवार को धक्का दे रहा होता है।

मोहल्ले के कुछ लड़के मुझसे बड़े थे। वे गंदी बातें करते। स्त्रियों के शरीरों के बारे में, रातों के बारे में, ऐसी चीज़ों के बारे में जिन्हें सुनते समय मैं शर्म से लाल हो जाता, लेकिन फिर भी उनके बीच से हटता नहीं था। उन बातों को सुनते हुए शरीर में एक अजीब-सी ऐंठन उठती थी, जैसे भीतर कोई बंद दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा हो।

वह इंटरनेट और मोबाइल का समय नहीं था। इच्छाएँ उस समय इतनी खुली हुई नहीं घूमती थीं। वे घरों की दीवारों, बंद आँगनों और किशोर लड़कों की चुप्पियों में पलती थीं। मध्यवर्गीय घरों में प्रेम लगभग अपराध की तरह लिया जाता था। लड़कियों की तरफ़ देर तक देखना भी अपराधबोध से भर देता।

इन्हीं दिनों मेरी पहचान उस स्त्री से हुई जिसे मोहल्ले वाले “लड़ाका” कहते थे।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि लोग किसी अकेली और बेचैन स्त्री को बहुत जल्दी कोई नाम दे देते हैं।

वह सचमुच झगड़ालू थी या नहीं, यह मैं आज भी नहीं कह सकता। हाँ, उसकी आवाज़ ऊँची थी। वह दबती नहीं थी। सब्ज़ी वाले से लेकर पानी वाले तक से भिड़ जाती। कई बार तो बिना वजह भी तमतमाई हुई दिखाई देती। मोहल्ले की औरतें उसके बारे में आधी आवाज़ में बातें करतीं।

लेकिन मेरे प्रति उसका व्यवहार बिल्कुल अलग था।

वह मुझे देखते ही बुला लेती।

“आओ इधर।”

और फिर कुछ न कुछ खाने को देती — कभी गुड़, कभी ठंडी बची हुई रोटी पर चीनी डालकर, कभी आम का टुकड़ा।

घर में यह बात पसंद नहीं की जाती थी।

माँ कई बार कहतीं—

“ज़्यादा मत बैठा करो उसके यहाँ।”

लेकिन कारण कभी साफ़ नहीं बतातीं।

शायद बड़े लोग कुछ चीज़ों को शब्दों में नहीं, केवल हावभावों में समझाते हैं।

उसका पति फेरी लगाता था। कई-कई दिनों तक घर नहीं लौटता। और जब लौटता तो घर में एक अजीब तनाव भर जाता। उसकी आवाज़ भारी थी और शराब की गंध दूर से आने लगती। कई बार रात में उनके झगड़े सुनाई देते। बर्तन गिरने की आवाज़। दबे हुए रोने की आवाज़। फिर सन्नाटा।

एक बार मैंने उसे अगले दिन देखा था। आँख के नीचे हल्की सूजन थी। लेकिन वह ऐसे बात कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो।

उसी गर्मी की एक रात की बात है।

बिजली चली गई थी।

उस समय बिजली जाना केवल तकनीकी खराबी नहीं होता था; पूरा मोहल्ला अचानक एक सामूहिक अँधेरे में बदल जाता था। लोग घरों से बाहर निकल आते। कोई हाथ का पंखा झलता। कोई चारपाई डाल देता। बूढ़े लोग ट्रांजिस्टर पर “हवा महल” सुनते। बच्चे अँधेरे में छुपन-छुपाई खेलने लगते।

उस रात भी गली में लोग छोटे-छोटे समूहों में बैठे थे।

वह भी वहीं थी।

मैंने ध्यान दिया कि वह उस दिन सामान्य से कुछ अधिक चुप थी।

फिर धीरे-धीरे जाने कैसे मैं उसके पास जाकर बैठ गया।

इतना पास कि उसकी देह से आती मिली-जुली गंध महसूस होने लगी — पसीने, तेल और किसी पुराने फूल जैसी हल्की गंध।

अँधेरे में चेहरों की जगह साँसें अधिक महसूस होती हैं।

वह धीरे-धीरे बात करती रही। मोहल्ले की बातें। गर्मी की शिकायत। बीच-बीच में चुप्पी।

लेकिन मुझे लग रहा था कि उसकी साँसें कुछ गहरी हैं।

एक अजीब बात मैंने पहले भी नोट की थी। जब कभी मैं उसके बहुत पास होता, उसकी आँखें बदल जातीं। उनमें एक ऐसी थकान और बेचैनी आ जाती जिसे मैं समझ नहीं पाता था। वह कभी-कभी बहुत गहरी साँस लेती, जैसे भीतर कुछ रोक रही हो।

उस समय यह सब मुझे डरावना भी लगता था और आकर्षक भी।

किशोरावस्था शायद यही होती है — भय और आकर्षण का एक साथ जन्म लेना।

कुछ दिन बाद दोपहर में मैं उसके घर गया। शायद कोई डिब्बा लौटाने। दरवाज़ा आधा खुला था। वह भीतर खाट पर बैठी थी। बाल खुले थे। चेहरा बुझा हुआ। शायद पिछली रात फिर झगड़ा हुआ था।

मुझे देखकर उसने जल्दी से आँसू पोंछे और सामान्य स्वर में बात करने लगी।

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं खड़ा रहा।

मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या कहूँ।

तभी अचानक बिजली चली गई।

कमरा एकदम अँधेरा हो गया।

और अगले ही क्षण उसने मुझे कसकर पकड़ लिया।

इतना कसकर कि मैं उसकी साँसें अपनी गर्दन पर महसूस करने लगा।

वे साँसें लंबी और काँपती हुई थीं।

उसकी पकड़ में भय भी था, अकेलापन भी, और कुछ ऐसा भी जिसे उस उम्र में मैं समझ नहीं सकता था।

मेरा पूरा शरीर सख्त हो गया।

मैं डर गया।

लेकिन उसी डर में एक विचित्र सुख भी मिला हुआ था।

जैसे पहली बार किसी दूसरे मनुष्य का दुख, शरीर के रास्ते मेरे भीतर उतर रहा हो।

कुछ क्षण बाद उसकी पकड़ ढीली हुई।

और मैं तुरंत भाग आया।

बहुत दूर तक भागता रहा।

उस शाम मैं देर तक काँपता रहा।

लेकिन उसके बाद कई दिनों तक भीतर एक गुप्त इच्छा बनी रही कि वैसा क्षण फिर आए।

मैं फिर उसके पास जाता।

बैठता।

बातें करता।

लेकिन वह बदल चुकी थी।

अब वह बहुत संयत रहती।

धीमी आवाज़ में बोलती।

कभी अनावश्यक पास नहीं बैठती।

जैसे उस एक क्षण के बाद उसने अपने भीतर कुछ वापस बंद कर लिया हो।

धीरे-धीरे समय बीत गया।

मैं बड़ा हो गया।

शहर छूट गया।

लेकिन आज भी कभी-कभी अँधेरे कमरे में अचानक किसी की गहरी साँस सुनाई देती है तो वह रात याद आ जाती है।

अब समझता हूँ कि उस रात उसने मुझे नहीं पकड़ा था।

वह शायद अपने अकेलेपन, अपने भय, अपने अपमान, अपने भीतर वर्षों से जमा किसी अँधेरे को पकड़ रही थी।

और मैं केवल संयोग से वहाँ मौजूद था।

मनुष्य कई बार प्रेम नहीं करता।

वह केवल डूबने से पहले किसी को पकड़ लेना चाहता है।

मुकेश ,,,,,,,

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