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Wednesday, 27 May 2026

रंगों के पीछे छिपी हुई स्त्री

 

उस स्त्री को रंगों से असामान्य प्रकार का लगाव था।
इतना असामान्य कि लोग उसे धीरे-धीरे “रंगों वाली औरत” कहने लगे थे।
वह शहर के पुराने कला-महाविद्यालय में चित्रकला पढ़ाती थी। उम्र लगभग चालीस के आसपास रही होगी। चेहरे पर कोई विशेष सौंदर्य नहीं, पर उसकी आँखों में एक अजीब-सी सतर्कता थी — जैसे वह लोगों को नहीं, उनके भीतर के रंगों को देखती हो।
उसका नाम था — मृणाल।
वह कहा करती थी—
“मनुष्य कभी झूठ नहीं बोलता। उसके चुने हुए रंग बोल देते हैं कि उसके भीतर क्या चल रहा है।”
शुरू में विद्यार्थियों को यह केवल कलात्मक सनक लगती थी।
लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने देखा कि मृणाल सचमुच लोगों के रंगों से उनके मन का अनुमान लगा लेती थी।
एक लड़का था जो हर चित्र में केवल धूसर और नीले रंग भरता था।
मृणाल ने एक दिन उससे पूछा—
“तुम बहुत दिनों से ठीक से सोए नहीं हो न?”
लड़का चौंक गया।
फिर उसने धीरे से कहा—
“पिता अस्पताल में हैं।”
एक लड़की थी जो हर चित्र में पीले रंग को अत्यधिक गाढ़ा कर देती थी।
मृणाल उसे देर तक देखती रही।
“तुम बहुत हँसती हो लोगों के बीच… लेकिन अकेले में घबराहट होती है।”
लड़की रो पड़ी।
धीरे-धीरे यह बात पूरे कॉलेज में फैल गई कि मृणाल रंगों से मन पढ़ लेती है।
लेकिन किसी को यह नहीं मालूम था कि रंगों का यह जुनून उसके भीतर कैसे पैदा हुआ।
कई वर्ष पहले उसका विवाह हुआ था।
पति मनोचिकित्सक था — शांत, पढ़ा-लिखा, व्यवस्थित।
शुरू में उसे लगा था कि वह समझ लिया गया है।
पर विवाह के दो-तीन वर्षों बाद उसने महसूस किया कि उसका पति उसे एक स्त्री की तरह नहीं, एक “केस-स्टडी” की तरह देखने लगा है।
जब वह उदास होती, वह कहता—
“यह हल्का अवसाद है।”
जब वह क्रोधित होती—
“तुम्हारे भीतर suppressed anger है।”
जब वह प्रेम चाहती—
“तुम emotional dependency develop कर रही हो।”
धीरे-धीरे मृणाल को लगा कि उसकी सारी भावनाएँ चिकित्सकीय शब्दों में बदलती जा रही हैं।
एक रात उसने अपने पति से पूछा—
“क्या तुमने कभी मुझे सिर्फ देखा है? बिना विश्लेषण किए?”
पति मुस्करा दिया।
“हर मनुष्य विश्लेषण ही तो है।”
उसी रात पहली बार मृणाल ने पूरी दीवार पर गहरा लाल रंग पोत दिया था।
सुबह तक।
सिर्फ लाल।
ऐसा लाल जिसमें क्रोध भी था, अपमान भी, और भीतर कहीं दबा हुआ प्रेम भी।
पति ने दीवार देखी और बहुत देर तक चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम्हें therapy की ज़रूरत है।”
मृणाल ने उसी दिन घर छोड़ दिया।
उसके बाद उसने रंगों का अध्ययन शुरू किया।
सिर्फ चित्रकला नहीं—
मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान, धर्म, लोककथाएँ, यहाँ तक कि अस्पतालों की दीवारों के रंग तक।
उसे पता चला कि कुछ जेलों में कैदियों की हिंसा कम करने के लिए गुलाबी रंग प्रयोग किया गया था।
कि नीला रंग रक्तचाप कम कर सकता है।
कि कुछ मानसिक रोगियों को पीला रंग असह्य लगता है।
लेकिन इन सबके बीच उसे सबसे विचित्र बात यह लगी कि हर मनुष्य अपने दुःख का एक निजी रंग चुनता है।
किसी का दुःख नीला होता है।
किसी का काला।
किसी का बिल्कुल सफेद।
और तभी से वह लोगों के कपड़ों, घरों, चित्रों और यहाँ तक कि उनकी लिखावट की स्याही तक को देखने लगी।
उसे लगता- मनुष्य अपने भीतर का रंग छिपा नहीं सकता।
उस वर्ष सर्दियाँ बहुत लंबी थीं।
कॉलेज में एक नया छात्र आया— आर्यन।
बहुत कम बोलने वाला लड़का।
वह हमेशा हरे रंग से चित्र बनाता था।
पर वे हरे रंग जीवित नहीं लगते थे।
उनमें कुछ सड़ा हुआ था।
जैसे बारिश के बाद दीवारों पर उग आने वाली सीलन।
मृणाल उसे देखकर असहज हो जाती।
एक दिन उसने उससे पूछा
“तुम्हें हरा रंग इतना क्यों पसंद है?”
लड़के ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
“क्योंकि मरने से पहले चीज़ें हरी पड़ने लगती हैं।”
मृणाल के भीतर अचानक ठंड उतर गई।
उस रात वह सो नहीं सकी।
उसे बार-बार वही हरे चित्र याद आते रहे।
अगले कई दिनों तक उसने देखा कि लड़का अपने चित्रों में पेड़ बनाता है— लेकिन बिना पत्तों के।
घर बनाता है— लेकिन खिड़कियों के बिना।
चेहरे बनाता है— लेकिन आँखों के बिना।
और हर चित्र में वह सड़ा हुआ हरा रंग।
एक दिन मृणाल ने अचानक उससे पूछा—
“क्या तुम किसी को मारना चाहते हो?”
लड़का मुस्कराया।
बहुत हल्का।
“पहले खुद को।”
उसके बाद कई महीनों तक मृणाल उस लड़के के साथ बैठती रही।
उससे बातें करती रही।
कभी चित्रों के बारे में।
कभी बचपन के बारे में।
कभी उन रंगों के बारे में जिन्हें देखकर मनुष्य रो पड़ता है।
धीरे-धीरे लड़के के चित्र बदलने लगे।
हरे रंग के बीच हल्का नीला आने लगा।
फिर कहीं-कहीं पीला।
एक दिन उसने पहली बार एक खिड़की बनाई।
मृणाल देर तक उसे देखती रही।
उसे लगा
शायद मनुष्य का मन भी एक कैनवास है।
और यदि सही रंग धीरे-धीरे वापस लौटा दिए जाएँ, तो सबसे अंधेरे चित्र में भी कहीं एक खिड़की खुल सकती है।
उस शाम वह कॉलेज से घर लौटी तो कई वर्षों बाद उसने अपनी दीवार पर फिर रंग लगाया।
लेकिन इस बार लाल नहीं।
बहुत हल्का नीला।
वैसा नीला
जैसा बारिश रुकने के बाद देर शाम आकाश में बचा रह जाता है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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