प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — अष्टम मंत्र
वैश्वानर सूर्य, प्राण और सर्वात्मभाव का वैदिक रहस्य
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानःप्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥८॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
यह सूर्य — विश्वरूप, हरिण (तेजस्वी एवं गति सम्पन्न), जातवेदस् (समस्त जगत् का ज्ञाता),परम आश्रय, एकमात्र ज्योति, तथा ताप प्रदान करने वाला है।
हजारों किरणों से युक्त यह सूर्य अनेक रूपों में स्थित होकर समस्त प्राणियों के प्राणस्वरूप उदित होता है।
भावार्थ
यह मंत्र सूर्य को केवल भौतिक सूर्य नहीं मानता।
यहाँ सूर्य —प्राण, चेतना, ब्रह्म, और विश्वात्मा का प्रतीक है।
“सहस्ररश्मि” का अर्थ केवल प्रकाश नहीं, बल्कि चेतना की अनन्त अभिव्यक्तियाँ हैं।
अन्वय
एषः सूर्यः विश्वरूपम्, हरिणम्, जातवेदसम्, परायणम्, एकम् ज्योतिः, तपन्तम्।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्रजानाम् प्राणः उदयति।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
विश्वरूपं | विश्व + रूपम् | कर्मधारय |
जातवेदसं | जात + वेदसम् | बहुव्रीहि |
ज्योतिरेकं | ज्योतिः + एकम् | विसर्ग संधि |
तपन्तम् | तप् + शतृप्रत्यय | धातुरूप |
सहस्ररश्मिः | सहस्र + रश्मिः | समास |
शतधा | शत + धा | अव्ययीभाव |
प्रजानामुदयति | प्रजानाम् + उदयति | व्यंजन संधि |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. विश्वरूपम् : - सम्पूर्ण विश्व जिसका रूप है। विराट चेतना।
२. हरिणम् : - धातु — “हृ” (गमन)
अर्थ — तीव्र गति वाला, प्रकाशमान, जीवनगामी। वैदिक साहित्य में सूर्य के लिए प्रयुक्त विशेषण।
३. जातवेदसम् : - “जातानि वेद” — जो समस्त उत्पन्न वस्तुओं को जानता है। यह अग्नि और सूर्य दोनों का वैदिक नाम है।
४. परायणम् : - परम आश्रय। अंतिम गन्तव्य।
५. सहस्ररश्मिः - अनन्त किरणों वाला। प्रतीकात्मक रूप से — अनन्त चेतना-प्रवाह।
६. शतधा वर्तमानः - अनेक रूपों में स्थित। एक चेतना की अनेक अभिव्यक्तियाँ।
आदि शंकराचार्य भाष्य (मूल संस्कृत — संशोधित एवं शुद्ध रूप)
विश्वरूपं सर्वरूपं हरिणं रश्मिमन्तं जातवेदसं जातमज्ञानं परायणं सर्वप्राणाश्रयं ज्योतिरेकं सर्वप्राणिनां चक्षुर्भूतमद्वितीयं तपन्तं तापक्रियां कुर्वन्तं स्वात्मानं सः सूर्यो विज्ञानवन्तो ब्रह्मविदः। कोऽसौ यं विज्ञातवन्तः? स एष चराचरात्मकः अनेकरूपः शतधा अनेकधा प्राणभेदेन वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं —
यह सूर्य — समस्त रूपों वाला, किरणों से युक्त, समस्त उत्पन्न जगत् का ज्ञाता, सभी प्राणियों का आश्रय, एकमात्र ज्योति, तथा सभी प्राणियों की आँखों के समान है।
यह अद्वितीय सूर्य ताप प्रदान करता है। ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी इसी सूर्य में अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करते हैं।
यह वही चेतना है जो चर और अचर जगत् में अनेक रूपों में प्राणभेद से स्थित होकर समस्त प्राणियों में उदित होती है।
दार्शनिक विवेचन
१. सूर्य का आध्यात्मिक रूपान्तरण
यहाँ सूर्य केवल खगोलीय सत्ता नहीं।
वह — प्राण, चेतना, आत्मा, ब्रह्म का प्रतीक बन जाता है।
२. “जातवेदस्” का अर्थ
यह शब्द वैदिक अग्नि के लिए प्रसिद्ध है।
अर्थ —जो सम्पूर्ण सृष्टि को जानता है।यहाँ सूर्य को सर्वज्ञ चेतना के रूप में देखा गया है।
३. “ज्योतिरेकं”- उपनिषदों में “ज्योति” केवल प्रकाश नहीं।
वह — चैतन्य, आत्मप्रकाश, ज्ञान का प्रतीक है।
४. सूर्य और आत्मा
शंकराचार्य कहते हैं — ब्रह्मवेत्ता सूर्य में अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करते हैं।यह अद्वैत वेदान्त की महान दृष्टि है।
५. सहस्ररश्मि : चेतना की अनन्त अभिव्यक्तियाँ
सूर्य एक है, पर उसकी किरणें असंख्य।
इसी प्रकार — आत्मा एक है, जीव अनेक प्रतीत होते हैं।
६. चराचरात्मक विश्व
शंकराचार्य “चराचरात्मक” शब्द का प्रयोग करते हैं।
अर्थात् — चल, अचल, सूक्ष्म, स्थूल — सब उसी प्राण की अभिव्यक्ति हैं।
अन्य उपनिषदों से साम्य
ईशावास्य उपनिषद् :- -“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।”
मुण्डक उपनिषद् :-“तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।”
भगवद्गीता :- “यदादित्यगतं तेजः…”
शोधपूर्ण निबंध
सूर्य और विश्वचेतना : प्रश्नोपनिषद् का अद्वैत संकेत
प्रश्नोपनिषद् का अष्टम मंत्र वैदिक प्रतीकवाद और अद्वैत वेदान्त का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यहाँ सूर्य केवल भौतिक सत्ता नहीं; वह विश्वचेतना का दृश्य प्रतीक है।
वैदिक ऋषियों ने प्रकृति को केवल पदार्थ नहीं माना। उन्होंने उसमें चेतना का अनुभव किया। सूर्य इसलिए देवता बना क्योंकि वह जीवन का आधार है।
“सहस्ररश्मि” का विचार अत्यन्त गहरा है। चेतना एक है, पर उसकी अभिव्यक्तियाँ अनन्त हैं। यह अद्वैत का मूल सिद्धान्त है।
शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या आत्मविद्या के रूप में करते हैं। उनके लिए सूर्य बाहरी वस्तु नहीं; आत्मा का प्रतीक है।
यही कारण है कि ब्रह्मविद् सूर्य में अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करते हैं।
आधुनिक मनुष्य प्रकृति को वस्तु के रूप में देखता है। उपनिषद् उसे चेतना के रूप में अनुभव करता है। यही भारतीय दर्शन की विशिष्टता है।
प्रश्नोपनिषद् का अष्टम मंत्र सूर्य को विश्वप्राण और विश्वचेतना के रूप में स्थापित करता है।
यह मंत्र उद्घाटित करता है कि —
· सम्पूर्ण विश्व एक ही चेतना की अभिव्यक्ति है,
· सूर्य उसका दृश्य प्रतीक है,
· और आत्मा वही सार्वभौम ज्योति है जो समस्त प्राणियों में प्राणरूप से उदित होती है।
इस प्रकार यह मंत्र वैदिक देवता, उपनिषदिक आत्मविद्या और अद्वैत वेदान्त — तीनों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
मुकेश ,,,,,,,
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