बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)
रदीफ़: “नहीं देता है बदन”
क़ाफ़िया: बहने / कहने / रहने / सहने / ढहने / गहने
इश्क़ की आग को बहने नहीं देता है बदन,
दर्द आँखों से भी कहने नहीं देता है बदन।
रूह चाहती है तेरे इश्क़ में खो जाए मगर,
अपने अंदर कहीं रहने नहीं देता है बदन।
कितनी ख़ामोश मोहब्बत है मिरे सीने में,
ज़ख़्म भी खुल के कभी सहने नहीं देता है बदन।
मैंने चाहा था तेरे नाम पे मिट जाऊँ मगर,
अपने अहसास को ढहने नहीं देता है बदन।
तेरी यादों की तपिश आज भी बाक़ी है यहाँ,
दिल को वीरान यूँ रहने नहीं देता है बदन।
रूह उड़ना भी अगर चाहे फ़लक तक तो कभी,
ख़्वाब को हद से गुज़रने नहीं देता है बदन।
'मुकेश' इश्क़ में कैसी अजब क़ैद मिली है हमको,
रूह को चैन से भी रहने नहीं देता है बदन।
'मुकेश' ,,,,,,,,,,,,,,
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