आत्मैकत्व, अव्याकृत जगत् और ब्रह्म की सृष्टि-ईक्षा
ऐतरेयोपनिषद् के प्रथम मन्त्र पर शंकरभाष्य का समन्वित दार्शनिक विवेचन
मन्त्र
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत — लोकान्नु सृजा इति॥
आदि शंकराचार्य इस मन्त्र के भाष्य में “आत्मा” को किसी सीमित जीव, मन या शरीर के रूप में नहीं, बल्कि परम ब्रह्म — सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य — के रूप में स्थापित करते हैं। उनके अनुसार “आत्मा” शब्द की व्युत्पत्ति अनेक प्रकार से समझी जा सकती है।
“आप्नोति” धातु से आत्मा वह है जो सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है; “अत्ति” धातु से वह समस्त अनुभवों और सृष्टि का अन्तिम भोक्ता एवं संहाराधार है; तथा “अतति” धातु से वह अनन्त रूप से विस्तृत सत्ता है। इस प्रकार आत्मा कोई सीमित व्यक्तित्व नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व का आधारभूत चेतन तत्त्व है।
शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत्, जो वर्तमान में नाम, रूप और कर्म के असंख्य भेदों से विभक्त दिखाई देता है, सृष्टि से पूर्व केवल आत्मा ही था। उस समय जगत् “अव्याकृत” अवस्था में था — अर्थात् अप्रकट, अविभाजित और नाम-रूप से रहित। जैसे बीज में वृक्ष अप्रकट रूप से स्थित रहता है, वैसे ही सम्पूर्ण विश्व आत्मा में अव्यक्त रूप से स्थित था। सृष्टि के पश्चात् वही एक सत्ता विविध नामों, रूपों और क्रियाओं के माध्यम से अनेक प्रतीत होने लगी।
भाष्य में “नाम–रूप–कर्म–भेदभिन्नं जगत्” पद अत्यन्त महत्वपूर्ण है। शंकराचार्य के अनुसार संसार की समस्त विविधता नाम, रूप और कर्म पर आधारित है। वस्तुओं को दिए गए नाम मानसिक भेद उत्पन्न करते हैं; रूप इन्द्रियगोचर भिन्नता का अनुभव कराते हैं; और कर्म उनके प्रयोजन तथा कार्यक्षेत्र को निर्धारित करते हैं। किन्तु ये सभी भेद केवल व्यवहारिक स्तर पर सत्य हैं। तत्त्वतः सम्पूर्ण जगत् एक ही आत्मतत्त्व में अधिष्ठित है।
इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए शंकराचार्य जल और फेन का दृष्टान्त देते हैं। जैसे फेन, तरंग या बुद्बुद जल से पृथक् प्रतीत होते हुए भी वास्तव में जल ही हैं, वैसे ही जगत् आत्मा से पृथक् नहीं है। नाम और रूप के प्रकट होने से भिन्नता अनुभव होती है, पर मूल सत्ता अपरिवर्तित रहती है। यह दृष्टान्त अद्वैत वेदान्त के उस मूल सिद्धान्त को व्यक्त करता है कि विविधता अनुभवगत है, किन्तु सत्ता एक ही है।
“नान्यत्किञ्चन मिषत्” पद की व्याख्या करते हुए शंकराचार्य अन्य दार्शनिक मतों का गम्भीर खण्डन करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि से पूर्व आत्मा के अतिरिक्त कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं थी। यह प्रतिपादन विशेष रूप से उस समय प्रचलित भारतीय दार्शनिक प्रणालियों के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है।
सांख्य दर्शन के अनुसार जगत् का मूल कारण “प्रधान” या “प्रकृति” है — एक जड़, अवचेतन, त्रिगुणात्मक सत्ता, जिससे सम्पूर्ण विश्व विकसित होता है। सांख्य में पुरुष चेतन तो है, किन्तु निष्क्रिय साक्षी मात्र है; वास्तविक सृष्टि-प्रक्रिया प्रधान से मानी जाती है। शंकराचार्य इस मत का निषेध करते हुए कहते हैं कि जड़ प्रधान स्वयं किसी उद्देश्यपूर्ण सृष्टि का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि चेतना और संकल्प के बिना सुव्यवस्थित विश्व-रचना सम्भव नहीं। उपनिषद् का “स ईक्षत” — “उसने ईक्षण किया” — यह सिद्ध करता है कि जगत् का कारण चेतन सत्ता है, जड़ प्रकृति नहीं।
इसी प्रकार वैशेषिक दर्शन जगत् को परमाणुओं (अणुओं) से निर्मित मानता है। उनके अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के सूक्ष्म परमाणुओं के संयोग से विश्व की उत्पत्ति होती है। किन्तु शंकराचार्य प्रश्न उठाते हैं कि जड़ परमाणुओं में स्वयं संगठन, व्यवस्था और उद्देश्यबोध कैसे उत्पन्न होगा? यदि चेतन नियामक सत्ता न हो, तो परमाणु स्वतः सुव्यवस्थित जगत् की रचना नहीं कर सकते। इसलिए वे परमाणुवाद को भी अन्तिम कारण के रूप में अस्वीकार करते हैं।
यहाँ शंकराचार्य का उद्देश्य केवल अन्य दर्शनों का खण्डन करना नहीं, बल्कि यह स्थापित करना है कि जगत् का मूलाधार चेतना है, पदार्थ नहीं। अद्वैत वेदान्त के अनुसार चेतना कोई उपोत्पाद (by-product) नहीं, बल्कि अस्तित्व की मूल सत्ता है। पदार्थ, नाम, रूप और अनुभव उसी चेतना में प्रकट होते हैं।
यह दृष्टिकोण आधुनिक Consciousness Studies में उपस्थित कुछ Idealist और Panpsychist प्रवृत्तियों से भी संवाद स्थापित करता है, जहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या चेतना पदार्थ से उत्पन्न होती है, या पदार्थ स्वयं चेतना की अभिव्यक्ति है। ऐतरेयोपनिषद् का यह भाष्य स्पष्ट रूप से दूसरे पक्ष की ओर संकेत करता है।
इसके पश्चात् उपनिषद् कहता है — “स ईक्षत” — अर्थात् आत्मा ने ईक्षण किया कि “मैं लोकों की रचना करूँ।” यहाँ “ईक्षा” सामान्य मानसिक विचार नहीं, बल्कि चेतना की स्वाभाविक सृजनात्मक शक्ति है। शंकराचार्य इस पर उठने वाले दार्शनिक प्रश्न का समाधान भी देते हैं — यदि सृष्टि से पूर्व मन, इन्द्रियाँ और उपकरण नहीं थे, तो ब्रह्म ने विचार कैसे किया? वे उत्तर देते हैं कि ब्रह्म का ज्ञान इन्द्रियों पर आश्रित नहीं है; वह स्वभावतः सर्वज्ञ है। उसका ज्ञान स्वप्रकाश है, किसी बाह्य साधन से उत्पन्न नहीं।
इसी तथ्य की पुष्टि हेतु शंकराचार्य श्वेताश्वतर उपनिषद् के मन्त्र “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता” का स्मरण करते हैं। ब्रह्म बिना हाथ-पाँव के ग्रहण करता है, बिना नेत्रों के देखता है; क्योंकि इन्द्रियाँ स्वयं उसी चेतना से प्रकाशित होती हैं। मनुष्य इन्द्रियों के माध्यम से जानता है, किन्तु आत्मा स्वयं ज्ञानस्वरूप है।
इस सम्पूर्ण भाष्य का केंद्रीय तात्पर्य यह है कि सृष्टि की समस्त बहुलता मूलतः एक आत्मचेतना की अभिव्यक्ति है। जगत् आत्मा से पृथक् नहीं, बल्कि उसी का नाम-रूपात्मक प्राकट्य है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार भेद, परिवर्तन और विविधता व्यवहारिक स्तर पर अनुभव होते हैं; किन्तु परम सत्य एक अद्वितीय, स्वप्रकाश, सर्वव्यापक चेतना है।
यह प्रतिपादन आधुनिक चेतना-विमर्श के लिए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आधुनिक Phenomenology में Edmund Husserl “Pure Consciousness” या “Transcendental Ego” की चर्चा करते हैं, जबकि आधुनिक Cognitive Science यह प्रश्न उठाती है कि चेतना पदार्थ की उपज है या पदार्थ चेतना की अभिव्यक्ति। ऐतरेयोपनिषद् का यह भाष्य स्पष्ट रूप से चेतना की प्राथमिकता स्थापित करता है। यहाँ चेतना केवल अनुभव की साक्षी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का मूलाधार है।
इस प्रकार शंकराचार्य का यह भाष्य अद्वैत वेदान्त की मूल घोषणा को अत्यन्त सूक्ष्म और दार्शनिक रूप से प्रतिपादित करता है — सृष्टि से पूर्व केवल आत्मा था; वही एक सत्ता आज समस्त जगत् के रूप में प्रकट है। नाम और रूप बदलते हैं, किन्तु उनके आधार में स्थित शुद्ध आत्मचेतना नित्य, अविकार और अद्वितीय रहती है।
मुकेश ,,,,,,,
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