होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 14 May 2026

छठा तमाशा

 छठा तमाशा

आध्यात्मिक बाज़ार का तमाशा


इन दिनों

मोक्ष भी

ईएमआई पर मिलने लगा है।


हर गली में

एक नया गुरु है,

हर स्क्रीन पर

एक नया ज्ञान।


कहीं

तीन दिन में कुंडलिनी जागृत करने का दावा है,

कहीं

सात मिनट में तीसरी आँख खोलने का।


आध्यात्म अब

धीरे-धीरे

एक सुव्यवस्थित उद्योग बन गया है।


ध्यान भी पैकेज में है,

मौन भी शुल्क लेकर मिलता है।


लोग

भीतर की शांति खोजने निकलते हैं,

और लौटते समय

एक महँगी माला,

कुछ मोटिवेशनल वाक्य

और गुरुजी के साथ खिंचवाई हुई तस्वीर लेकर लौटते हैं।


अजीब समय है

जहाँ

अहंकार भी

आध्यात्मिक भाषा बोलने लगा है।


कोई कहता है—

“मैं बहुत जाग्रत आत्मा हूँ…”

कोई लिखता है—

“मैं अब 5D consciousness में जी रहा हूँ…”


और यह सब कहते हुए भी

उन्हें

थोड़ी-सी आलोचना सहन नहीं होती।


पहले साधु

जंगलों में खो जाते थे,

अब

एल्गोरिद्म में मिलते हैं।


उनके प्रवचन से ज़्यादा

उनकी वीडियो एडिटिंग चमकती है।


भक्ति भी अब

कैमरे का एंगल माँगती है।


किसी आश्रम में

हज़ारों लोग बैठे हैं,

मगर

बहुत कम लोग

सचमुच अपने भीतर बैठे हैं।


सबको अनुभव चाहिए,

पर साधना नहीं।

सबको शांति चाहिए,

पर अपने भ्रम छोड़ने की तैयारी नहीं।


और बाज़ार

मनुष्य की इसी अधीरता को बेच रहा है।


“Instant enlightenment…”

“Cosmic energy activation…”

“Manifest your destiny…”


जैसे आत्मा नहीं,

कोई मोबाइल ऐप अपडेट हो रहा हो।


मैं यह सब देखता हूँ

तो कभी-कभी

पुराने ऋषियों की याद आती है।


वे

कम बोलते थे,

धीरे चलते थे,

और अपने ज्ञान को

घोषणा की तरह नहीं,

साँस की तरह जीते थे।


उन्हें

अनुयायियों की संख्या से नहीं,

अपने भीतर के मौन से मतलब था।


मगर आज

मौन भी

माइक्रोफोन पर बोला जा रहा है।


और सबसे बड़ा दुख यह नहीं

कि बाज़ार आध्यात्म बेच रहा है


बल्कि यह है

कि थका हुआ मनुष्य

सचमुच शांति चाहता है,

और उसकी इसी प्यास को

तमाशे में बदला जा रहा है।


शायद

आध्यात्म का पहला कदम

किसी गुरु तक पहुँचना नहीं,

बल्कि

अपने भीतर के शोर को पहचानना था।


मगर अब

लोग भीतर उतरने से पहले ही

अपनी “स्पिरिचुअल सेल्फी” पोस्ट कर देते हैं।


और इस युग में

जहाँ साधना से ज़्यादा

उसकी ब्रांडिंग चमक रही है


आध्यात्म भी

धीरे-धीरे

एक विशाल तमाशा बनता जा रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment