प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न, तृतीय मंत्र
सृष्टिजिज्ञासा और ब्रह्माण्ड-विमर्श का उपनिषदिक आरम्भ
मूल मंत्र (शुद्ध देवनागरी पाठ)
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ ।
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥३॥
पदपाठ
अथ । कबन्धी । कात्यायनः । उपेत्य । पप्रच्छ ।
भगवन् । कुतः । ह । वा । इमाः । प्रजाः । प्रजायन्ते । इति ॥
हिन्दी अनुवाद
तत्पश्चात् कबन्धी कात्यायन ने समीप जाकर प्रश्न किया —
“हे भगवन्! ये समस्त प्रजाएँ किससे उत्पन्न होती हैं?”
यह प्रश्न केवल भौतिक सृष्टि के उद्गम का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व के मूल कारण की खोज का प्रश्न है।
भावार्थ
यहाँ कबन्धी कात्यायन का प्रश्न मानव-चेतना के सबसे प्राचीन और सार्वकालिक प्रश्नों में से एक है — “यह जगत कहाँ से आया?” उपनिषद् इस प्रश्न को केवल पदार्थ की उत्पत्ति तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसके पीछे स्थित चेतन सिद्धान्त की खोज करते हैं।
अन्वय
अथ कबन्धी कात्यायनः उपेत्य भगवन् पप्रच्छ —
“इमाः प्रजाः कुतः ह वा प्रजायन्ते?” इति।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
कुतो ह वा | कुतः + ह + वा | विसर्ग संधि |
प्रजायन्ति | प्र + जायन्ते | उपसर्ग संयोग |
उपेत्य | उप + इत्य | उपसर्ग संयोग |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
1. अथ
· अव्यय
· अर्थ : इसके बाद, तत्पश्चात्
· उपनिषदों में “अथ” प्रायः नवीन दार्शनिक प्रसंग के आरम्भ का सूचक है।
2. कबन्धी
· व्यक्तिवाचक संज्ञा
· ऋषि का नाम
3. कात्यायनः
· “कति” अथवा “कत्य” गोत्र से उत्पन्न
· प्रातिपदिक : कात्यायन
· पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन
4. उपेत्य
· उप + इ (गत्यर्थक धातु)
· ल्यबन्त अव्यय
· अर्थ : समीप जाकर
5. पप्रच्छ
· धातु : √प्रच्छ् (पूछना)
· लिट् लकार
· प्रथम पुरुष एकवचन
· अर्थ : पूछा
6. भगवन्
· “भग” + मतुप्
· सम्बोधन एकवचन
· अर्थ : ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य आदि गुणों से सम्पन्न
7. कुतः
· अव्यय
· अर्थ : किस कारण से? कहाँ से?
8. प्रजाः
· प्र + जन धातु
· स्त्रीलिंग, बहुवचन
· अर्थ : उत्पन्न प्राणी, जीवसमुदाय
9. प्रजायन्ते
· प्र + √जन्
· लट् लकार
· आत्मनेपद
· प्रथम पुरुष बहुवचन
· अर्थ : उत्पन्न होते हैं
आदि शंकराचार्य भाष्य (संस्कृत — यथावत)
अथ संवत्सरादूर्ध्वं कबन्धी कात्यायन उपेत्योपगम्य पप्रच्छ पृष्टवान्। हे भगवन् कुतः ह वा इमाः ब्राह्मणाद्याः प्रजाः प्रजायन्ते उत्पद्यन्ते। अपरविद्याकर्मगोः सम्प्रतिपत्त्योः यत्कार्यं या गतिस्तदुक्तव्यमिति तदर्थोऽयं प्रश्नः ॥३॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
एक वर्ष की तपश्चर्या पूर्ण होने के पश्चात् कबन्धी कात्यायन ऋषि के समीप जाकर पूछते हैं —
“हे भगवन्! ये ब्राह्मण आदि समस्त प्राणी किससे उत्पन्न होते हैं?”
शंकराचार्य कहते हैं कि यह प्रश्न केवल सामान्य सृष्टि-विज्ञान का प्रश्न नहीं है। इसका गूढ़ आशय यह है कि अपरविद्या (कर्म, यज्ञ आदि) और उसके द्वारा प्राप्त होने वाले फल एवं गति का मूल कारण क्या है — यह जानना।
अर्थात् प्रश्नकर्ता जगत् के पीछे स्थित कारणतत्त्व की खोज कर रहा है।
दार्शनिक विवेचन
यह मंत्र उपनिषदों की सृष्टिदृष्टि का प्रवेशद्वार है। मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही मनुष्य ने यह प्रश्न किया है
· यह जगत कैसे उत्पन्न हुआ?
· जीवन का मूल क्या है?
· पदार्थ और चेतना का सम्बन्ध क्या है?
प्रश्नोपनिषद् इस प्रश्न को अत्यन्त सूक्ष्म रूप में उठाता है।
“कुतः” — कारण की खोज
“कुतः” शब्द यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
यह केवल भौतिक कारण नहीं पूछता, बल्कि निमित्त और उपादान कारण दोनों की खोज करता है।
भारतीय दर्शन में सृष्टि के कारण को दो प्रकार से समझा गया —
1. उपादान कारण — जिससे जगत बना
2. निमित्त कारण — जिसने जगत की रचना की
उपनिषदों में ब्रह्म दोनों है।
सृष्टि-जिज्ञासा और वेदान्त
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है — “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्।” अर्थात् प्रारम्भ में केवल सत् था।
तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है — “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।”जिससे ये समस्त भूत उत्पन्न होते हैं।
प्रश्नोपनिषद् का यह प्रश्न उसी वैदिक परम्परा की निरन्तरता है।
“प्रजा” का व्यापक अर्थ
यहाँ “प्रजा” केवल मनुष्य नहीं है।
इसमें समस्त जीव, चेतना, प्रकृति और जीवन के विविध रूप सम्मिलित हैं।
कबन्धी का प्रश्न और वैज्ञानिक चेतना
यह अत्यन्त उल्लेखनीय है कि उपनिषद् प्रश्न पूछने से भयभीत नहीं होते। वे जिज्ञासा को धर्मविरोधी नहीं मानते।
यह भारतीय बौद्धिक परम्परा की महानता है।
वैदिक एवं उपनिषदिक सन्दर्भ
मुण्डकोपनिषद् - “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च।” जैसे मकड़ी स्वयं से जाल उत्पन्न करती है।
बृहदारण्यक उपनिषद् - “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्।”प्रारम्भ में केवल आत्मा था।
छान्दोग्य उपनिषद् -“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्।” सृष्टि से पूर्व केवल सत् था।
कठोपनिषद् - “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्।” परम कारण इन्द्रियातीत है।
शोधपूर्ण निबंध -प्रश्नोपनिषद् का तृतीय मंत्र और भारतीय सृष्टिदर्शन
प्रश्नोपनिषद् का यह मंत्र भारतीय दर्शन की उस महान जिज्ञासा का प्रतिनिधित्व करता है जिसने मानव-चेतना को केवल धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं रहने दिया। “कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते?” — यह प्रश्न केवल वैदिक ऋषि का प्रश्न नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति का प्रश्न है।
यूनानी दार्शनिकों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक, मनुष्य सदैव सृष्टि के मूल कारण को जानना चाहता रहा है। किन्तु उपनिषदों की विशेषता यह है कि वे सृष्टि को केवल पदार्थ की प्रक्रिया नहीं मानते। उनके लिए जगत् के पीछे चेतना का रहस्य है।
शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि यह प्रश्न अपरविद्या और कर्मफल की गति से भी सम्बद्ध है। इसका अर्थ यह है कि प्रश्नकर्ता केवल भौतिक जगत का कारण नहीं पूछ रहा, बल्कि जीवन के उद्देश्य और कर्म के परिणामों का भी मूल जानना चाहता है।
उपनिषदों में सृष्टि का अर्थ केवल ब्रह्माण्ड की रचना नहीं, बल्कि अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। ब्रह्म स्वयं को जगत् के रूप में प्रकट करता है।
यह दृष्टि आधुनिक भौतिकवाद से भिन्न है। आधुनिक विज्ञान प्रायः पदार्थ से चेतना की व्याख्या करता है; उपनिषद् चेतना से पदार्थ की।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रश्नोपनिषद् में सृष्टि का उत्तर किसी मिथकीय कथा के रूप में नहीं दिया जाता। वहाँ दार्शनिक विश्लेषण है। यही भारतीय चिन्तन की परिपक्वता है।
उपनिषदों का यह प्रश्न आधुनिक युग में भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। आज विज्ञान बिग-बैंग की बात करता है, किन्तु “उससे पहले क्या था?” — यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है। उपनिषद् इस प्रश्न को चेतना और ब्रह्म की दिशा में ले जाते हैं।
इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् का यह मंत्र भारतीय दार्शनिक परम्परा की वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और अस्तित्ववादी चेतना का अद्भुत संगम है।
प्रश्नोपनिषद् का यह तृतीय मंत्र सम्पूर्ण उपनिषद् की दार्शनिक दिशा निर्धारित करता है। यहाँ पहली बार सृष्टि और अस्तित्व के मूल कारण का प्रश्न उठाया गया है।
कबन्धी कात्यायन का प्रश्न केवल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन, कर्म, चेतना और ब्रह्म के रहस्य की खोज है।
यह मंत्र सिद्ध करता है कि भारतीय उपनिषद् केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि मानवता की महान दार्शनिक यात्राएँ हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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