“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मेरे भीतर एक कमरा था
जिसकी खिड़की हमेशा बंद रही
मैंने उसके बाहर बगीचे बनाए
चित्र टाँगे
दीपक जलाए
मगर खिड़की नहीं खोली
क्योंकि मुझे भय था
कि यदि वह खुल गई
तो जो हवा भीतर आएगी
वह मेरे सारे सजाए हुए अर्थ
उड़ा ले जाएगी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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