“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
एक छोटी-सी लौ थी
जिसे बचाने में मैंने आधी उम्र लगा दी
हवाओं से बचाया बारिशों से बचाया दूसरों की साँसों से भी बचाया
फिर एक दिन देखा
लौ तो जल रही है
मगर जिस घर के लिए उसे बचा रहा था
वह घर बहुत पहले अँधेरे के हवाले हो चुका था
मुकेश ,,,,,,,,,,
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