फना की गन्ध
फना की भी एक गन्ध होती है,
जैसे दीपक का आख़िरी तेल।
वह न ख़ुशी है, न ग़म,
बस एक मिटती हुई मौजूदगी।
अहंकार जब गलने लगता है,
तो आत्मा से एक धुआँ उठता है।
सूफ़ी दरवेशों की तरह वह धुआँ भी
अपने ही भीतर खो जाता है,
और बचता है सिर्फ़ एक ख़ामोश सुगन्ध
जो “मैं” को “तू” में बदल देती है।
मुकेश ,,,,,
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