चिंतन | - फ़ाइल–013 | अध्याय–13 | भाग–4 कर्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
चिंतन | - फ़ाइल–013 | अध्याय–13 | भाग–4 कर्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
कर्म
और कर्मफल का दार्शनिक भेद
मुख्य
प्रश्न (Central
Question)
क्या
"कर्म"
और "कर्मफल" केवल एक ही प्रक्रिया के दो चरण हैं, अथवा वे दो भिन्न दार्शनिक अवधारणाएँ हैं? यदि कर्म मनुष्य के अधिकार में है, तो क्या कर्मफल भी उसके अधिकार में है? क्या कर्म और परिणाम के बीच सीधा, निश्चित और अपरिवर्तनीय सम्बन्ध होता है, या उनके बीच अनेक कारण, परिस्थितियाँ, संयोग तथा अन्य कर्ताओं के कर्म भी सक्रिय रहते हैं?
मुख्य
विश्लेषण (Main
Analysis)
किसी
भी दार्शनिक विमर्श में सबसे पहले
यह स्पष्ट करना आवश्यक होता
है कि अध्ययन का
विषय क्या है और
क्या नहीं। यदि यह भेद
प्रारम्भ में स्पष्ट न
किया जाए, तो आगे
का समस्त विवेचन भ्रमित हो सकता है।
कर्म और कर्मफल के सम्बन्ध में
भी यही स्थिति है।
सामान्य जीवन में दोनों
शब्द लगभग साथ-साथ
प्रयुक्त होते हैं, किन्तु
दार्शनिक दृष्टि से दोनों समान
नहीं हैं।
कर्म
का सम्बन्ध क्रिया (Action) से है, जबकि
कर्मफल का सम्बन्ध क्रिया
के परिणाम (Consequences of
Action) से है। पहली दृष्टि
में यह भेद सरल
प्रतीत होता है, परन्तु
वास्तविक प्रश्न यहीं से आरम्भ
होता है—क्या परिणाम
केवल उसी कर्म का
सीधा प्रभाव है, या वह
अनेक अन्य कारणों के
साथ मिलकर निर्मित होता है?
यदि
कोई किसान भूमि में बीज
बोता है, तो बीज
बोना उसका कर्म है। किन्तु उस
बीज का अंकुरित होना
केवल उसी कर्म का
परिणाम नहीं है। उसके
लिए उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त नमी, उपयुक्त तापमान,
सूर्य का प्रकाश, बीज
की गुणवत्ता और अनेक जैविक
प्रक्रियाओं का सहयोग भी
आवश्यक है। यदि वर्षा
न हो, तो उत्तम
बीज भी नष्ट हो
सकता है; यदि भूमि
अनुपयुक्त हो, तो परिश्रम
के बाद भी अपेक्षित
फसल नहीं मिल सकती।
यह
उदाहरण एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
दार्शनिक तथ्य की ओर
संकेत करता है—
कर्म
मनुष्य करता है; किन्तु कर्मफल केवल कर्म से नहीं, बल्कि कर्म और परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव से निर्मित होता है।
यही
कारण है कि कर्म
और कर्मफल को समान मान
लेना दार्शनिक भूल होगी।
कर्म
और कर्मफल : नियंत्रण (Control) का प्रश्न
कर्म
और कर्मफल के बीच सबसे
बड़ा अन्तर नियंत्रण (Control) का है।
मनुष्य
सामान्यतः अपने निर्णय, प्रयत्न
और कर्म पर कुछ
सीमा तक नियंत्रण रख
सकता है। वह यह
चुन सकता है कि
उसे सत्य बोलना है
या असत्य, परिश्रम करना है या
आलस्य, सहायता करनी है या
उपेक्षा। परन्तु वह यह सुनिश्चित
नहीं कर सकता कि
प्रत्येक कर्म का परिणाम
उसकी इच्छा के अनुसार ही
होगा।
यहीं
से कर्म और कर्मफल
का दार्शनिक विभाजन प्रारम्भ होता है।
मनुष्य—
कर्म का चयन कर सकता है, प्रयत्न की तीव्रता बढ़ा सकता है, अपने उद्देश्य को शुद्ध बना सकता है,किन्तु परिणाम पर उसका पूर्ण अधिकार नहीं होता।
यह
केवल धार्मिक कथन नहीं, बल्कि
जीवन का अनुभवजन्य सत्य
भी है।
क्या
कर्मफल कर्म का स्वचालित परिणाम है?
यह
प्रश्न सदियों से दार्शनिक विवाद
का विषय रहा है।
यदि
कर्म और कर्मफल के
बीच सम्बन्ध पूर्णतः यांत्रिक (Mechanical) होता, तो प्रत्येक सद्कर्म
का परिणाम तत्काल सुख और प्रत्येक
दुष्कर्म का परिणाम तत्काल
दुःख होना चाहिए था।
परन्तु वास्तविक जीवन ऐसा नहीं
दिखाता।
हम
देखते हैं—
- परिश्रमी
व्यक्ति असफल भी हो सकता है।
- आलसी
व्यक्ति कभी-कभी सफल दिखाई देता है।
- ईमानदार
व्यक्ति संकट झेल सकता है।
- अन्यायी
व्यक्ति दीर्घकाल तक समृद्ध रह सकता है।
यदि
केवल बाहरी घटनाओं को ही कर्मफल
माना जाए, तो कर्मफल
का सिद्धान्त अनेक प्रश्नों के
घेरे में आ जाता
है।
यहीं
से भारतीय दर्शन ने कर्मफल को
केवल तात्कालिक बाह्य परिणाम तक सीमित न
रखकर उसके व्यापक आयामों
पर विचार किया।
कर्म,
उद्देश्य और परिणाम
कर्म
के तीन प्रमुख आयाम
माने जा सकते हैं—
- कर्ता
(Agent) — जिसने
कर्म किया।
- उद्देश्य
(Intention) — किस
भावना या संकल्प से कर्म किया गया।
- परिणाम
(Outcome) — उससे
वास्तव में क्या घटित हुआ।
ये
तीनों सदैव एक-दूसरे
से पूर्णतः मेल खाएँ, यह
आवश्यक नहीं।
एक
चिकित्सक रोगी को बचाने
का पूरा प्रयास करता
है, फिर भी रोगी
की मृत्यु हो सकती है।
एक
वैज्ञानिक नई तकनीक मानव-कल्याण के लिए विकसित
करता है, पर वही
तकनीक युद्ध में भी प्रयुक्त
हो सकती है।
एक
शिक्षक किसी छात्र को
प्रेरित करता है, किन्तु
वही प्रेरणा किसी दूसरे छात्र
पर कोई प्रभाव नहीं
डालती।
इन
उदाहरणों से स्पष्ट होता
है कि उद्देश्य और परिणाम के बीच अनेक मध्यवर्ती कारण कार्य करते हैं।
मानव
मस्तिष्क प्रायः सरल सम्बन्ध खोजता
है—कर्म → फल
किन्तु
वास्तविकता प्रायः अधिक जटिल होती
है—
कर्म
→ परिस्थितियाँ
→ अन्य व्यक्तियों के कर्म → प्राकृतिक कारण → सामाजिक संरचनाएँ → समय → परिणाम
अर्थात्
कर्मफल अनेक बार बहु-कारणीय (Multicausal) और जटिल (Complex) प्रक्रिया का परिणाम होता
है।
यही
कारण है कि आधुनिक
जटिलता-विज्ञान (Complexity Science)
और भारतीय कर्मफल-विमर्श के बीच एक
रोचक संवाद सम्भव होता है। दोनों
यह स्वीकार करते हैं कि
किसी परिणाम को समझने के
लिए केवल एक कारण
पर्याप्त नहीं होता; अनेक
परस्पर क्रियाशील कारणों का अध्ययन आवश्यक
है। किन्तु दोनों के उद्देश्य भिन्न
हैं—जटिलता-विज्ञान प्राकृतिक और सामाजिक प्रणालियों
का विश्लेषण करता है, जबकि
कर्मफल का दार्शनिक सिद्धान्त
नैतिक उत्तरदायित्व और मानव अनुभव
के प्रश्नों को भी सम्मिलित
करता है।
कर्म
और कर्मफल : अधिकार और उत्तरदायित्व
यहीं
एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण भेद उभरता है।
मनुष्य
का अधिकार (Agency) मुख्यतः कर्म पर है,
जबकि उसका उत्तरदायित्व
(Responsibility) केवल
परिणाम से नहीं, बल्कि
उसके उद्देश्य, प्रयत्न और निर्णय से
भी जुड़ा होता है।
यदि
कोई व्यक्ति पूरी सावधानी से
वाहन चला रहा था
और अचानक प्राकृतिक कारणों से दुर्घटना हो
गई, तो परिणाम दुःखद
होने पर भी उसका
नैतिक उत्तरदायित्व उसी प्रकार नहीं
होगा जैसा किसी लापरवाह
चालक का होता।
इस
प्रकार नैतिक उत्तरदायित्व और घटना का परिणाम सदैव समान नहीं
होते।
यही
भेद आगे चलकर फलासक्ति,
प्रारब्ध, भाग्य, नियति, स्वतंत्र इच्छा तथा नैतिक न्याय जैसे जटिल विषयों
की आधारभूमि बनता है।
|
कर्म (Action) |
कर्मफल (Consequence) |
|
क्रिया
का आरम्भ |
क्रिया
का प्रभाव |
|
कर्ता
से प्रारम्भ |
अनेक
कारणों से निर्मित |
|
उद्देश्य
का समावेश |
उद्देश्य
+ परिस्थिति + समय + अन्य कारण |
|
अपेक्षाकृत
नियंत्रित |
पूर्णतः
नियंत्रित नहीं |
|
वर्तमान
में सम्पन्न |
तत्काल,
विलम्बित या अप्रत्याशित हो
सकता है |
|
उत्तरदायित्व
का आधार |
उत्तरदायित्व
की परीक्षा |
मुख्य
विवाद (Major
Debates)
- क्या
प्रत्येक कर्म का कोई निश्चित कर्मफल होता है?
- क्या
केवल परिणाम देखकर किसी कर्म का नैतिक मूल्यांकन किया जा सकता है?
- यदि
उद्देश्य श्रेष्ठ हो और परिणाम प्रतिकूल, तो नैतिक उत्तरदायित्व किसका होगा?
- क्या
कर्मफल का सम्बन्ध केवल बाहरी घटनाओं से है, या आन्तरिक चेतना से भी?
आज
की शोध-स्थिति (Current Research
Position)
आधुनिक
नैतिक दर्शन, मनोविज्ञान और व्यवहार-विज्ञान
इस बात पर व्यापक
सहमति रखते हैं कि
किसी कर्म का मूल्यांकन
केवल उसके परिणाम से
नहीं किया जा सकता।
उद्देश्य (Intention), परिस्थितियाँ
(Circumstances), उपलब्ध
जानकारी (Available
Information) तथा निर्णय-प्रक्रिया (Decision Process)
भी समान रूप से
महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर,
जटिलता-विज्ञान और निर्णय-विज्ञान
यह संकेत देते हैं कि
वास्तविक जीवन के परिणाम
प्रायः बहु-कारणीय होते
हैं और उन्हें किसी
एक कारण से पूर्णतः
नहीं समझा जा सकता।
अब
भी अनुत्तरित प्रश्न (Unanswered
Questions)
- क्या
कोई ऐसा सार्वभौमिक सिद्धान्त है जो प्रत्येक कर्म और उसके परिणाम को जोड़ सके?
- क्या
नैतिक उत्तरदायित्व परिणाम से स्वतंत्र हो सकता है?
- क्या
परिणाम का मूल्यांकन वर्तमान तक सीमित होना चाहिए, या दीर्घकालिक प्रभाव भी सम्मिलित किए जाने चाहिए?
- क्या
कर्मफल का प्रश्न कारणता (Causation) से आगे जाकर न्याय (Justice) का प्रश्न बन जाता है?
समन्वित
निष्कर्ष
(Integrated Conclusion)
कर्म
और कर्मफल एक ही प्रक्रिया
के दो चरण अवश्य
हैं, किन्तु वे समान अवधारणाएँ
नहीं हैं। कर्म मनुष्य
की चेतन क्रिया है;
कर्मफल उस क्रिया से
उत्पन्न प्रभावों का व्यापक तंत्र
है। कर्म का अध्ययन
हमें कर्तृत्व समझाता है, जबकि कर्मफल
का अध्ययन हमें यह सिखाता
है कि कोई भी
परिणाम केवल एक क्रिया
का सीधा प्रतिफल नहीं,
बल्कि अनेक कारणों, परिस्थितियों,
समय, संयोग और नैतिक उत्तरदायित्व
के परस्पर सम्बन्धों से निर्मित हो
सकता है। इसी बोध
से आगे चलकर प्रारब्ध,
भाग्य, नियति और स्वतंत्र इच्छा जैसे गहन दार्शनिक
प्रश्न जन्म लेते हैं।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
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