चिन्तन - ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड - भाग–14 : भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान — चेतना पर संवाद, समानताएँ, भिन्नताएँ और सीमाएँ
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड | अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन | फ़ाइल–010 | अध्याय–10 : चेतना क्या है? | भाग–14 : भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान — चेतना पर संवाद, समानताएँ, भिन्नताएँ और सीमाएँ
भाग–14
: भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान — चेतना पर संवाद, समानताएँ, भिन्नताएँ और सीमाएँ
(Indian Philosophy and Modern Science: Dialogue,
Convergences, Divergences and Limits)
अब
तक इस अध्याय में हमने चेतना के विषय में भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन तथा आधुनिक
तंत्रिका-विज्ञान और समकालीन चेतना-सिद्धान्तों का स्वतंत्र अध्ययन किया। प्रत्येक
परम्परा ने चेतना को अपनी-अपनी पद्धति, भाषा और प्रमाण-व्यवस्था (Epistemic
Framework) के अनुसार समझने का प्रयास किया है।
अब
स्वाभाविक प्रश्न यह है—
क्या
इन सभी दृष्टियों के बीच कोई संवाद सम्भव है?
यह
प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आज के वैश्विक बौद्धिक परिवेश में दो अतिवादी
प्रवृत्तियाँ समान रूप से दिखाई देती हैं।
एक
ओर कुछ लोग आधुनिक विज्ञान के प्रत्येक नए निष्कर्ष को प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में
पहले से सिद्ध मान लेने का प्रयास करते हैं।
दूसरी
ओर कुछ लोग प्राचीन दार्शनिक परम्पराओं को केवल धार्मिक विश्वास मानकर उन्हें वैज्ञानिक
विमर्श से पूर्णतः बाहर कर देना चाहते हैं।
दोनों
दृष्टियाँ एकांगी हैं।
शोधपरक
अध्ययन का उद्देश्य इनमें से किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि यह देखना है
कि विभिन्न ज्ञान-परम्पराएँ किन प्रश्नों पर संवाद कर सकती हैं, किन बिन्दुओं पर
उनके निष्कर्ष भिन्न हैं और किन विषयों पर अभी निर्णय सम्भव नहीं है।
संवाद
की प्रथम शर्त : पद्धतियों का सम्मान
भारतीय
दर्शन और आधुनिक विज्ञान की तुलना करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि दोनों की कार्य-पद्धति
(Methodology) समान नहीं है।
भारतीय
दर्शन मुख्यतः निम्न आधारों पर विकसित हुआ—
- प्रत्यक्ष
अनुभव (Direct Experience)
- तर्क
(Reasoning)
- आत्मानुभूति
(Inner Realization)
- ध्यान
एवं साधना (Meditative Inquiry)
- दार्शनिक
विश्लेषण (Philosophical Analysis)
इसके
विपरीत आधुनिक विज्ञान का आधार है—
- प्रेक्षण
(Observation)
- नियंत्रित
प्रयोग (Controlled Experiment)
- मापन
(Measurement)
- सांख्यिकीय
परीक्षण (Statistical Validation)
- पुनरुत्पादकता
(Replicability)
अतः
दोनों परम्पराएँ एक ही प्रश्न पूछ सकती हैं, किन्तु उनके उत्तर खोजने की विधियाँ भिन्न
होती हैं।
इसी
कारण दोनों की तुलना करते समय उनकी पद्धतियों का सम्मान करना अनिवार्य है।
संवाद
के प्रमुख क्षेत्र
यद्यपि
भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान की पृष्ठभूमियाँ अलग हैं, फिर भी कुछ ऐसे प्रश्न हैं
जिन पर दोनों का संवाद सम्भव है।
चेतना
और मस्तिष्क
आधुनिक
तंत्रिका-विज्ञान मस्तिष्क और चेतन अनुभव के बीच गहरे सम्बन्ध को स्वीकार करता है।
भारतीय
दर्शन, विशेषकर वेदान्त और योग, मन तथा मस्तिष्क को चेतना के उपकरण के रूप में देखते
हैं।
यहाँ
एक समान प्रश्न उपस्थित होता है—
क्या
मस्तिष्क चेतना उत्पन्न करता है, या चेतना मस्तिष्क के माध्यम से व्यक्त होती है?
विज्ञान
इस प्रश्न का अंतिम उत्तर अभी नहीं देता।
भारतीय
दर्शन का उत्तर विभिन्न परम्पराओं में भिन्न-भिन्न है।
अतः
यह संवाद का क्षेत्र है, निष्कर्ष का नहीं।
ध्यान
(Meditation) और चेतना
यह
वह क्षेत्र है जहाँ भारतीय परम्पराओं और आधुनिक विज्ञान के बीच सबसे अधिक प्रत्यक्ष
संवाद विकसित हुआ है।
ध्यान,
योग तथा मानसिक प्रशिक्षण के प्रभावों पर अनेक वैज्ञानिक अध्ययन किए जा चुके हैं।
इन
अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि नियमित ध्यान—
- ध्यान-क्षमता
को प्रभावित कर सकता है।
- तनाव
को कम करने में सहायक हो सकता है।
- मस्तिष्क
की कुछ कार्यात्मक संरचनाओं में परिवर्तन से सम्बद्ध पाया गया है।
किन्तु
इन निष्कर्षों से यह सिद्ध नहीं होता कि किसी विशेष दार्शनिक सिद्धान्त की पुष्टि हो
गई है।
विज्ञान
ध्यान के प्रभावों का अध्ययन करता है; वह आध्यात्मिक निष्कर्षों की स्वतः पुष्टि नहीं
करता।
आत्मबोध
(Selfhood)
भारतीय
दर्शन में आत्मा, पुरुष, जीव, विज्ञान-प्रवाह या अनात्म—विभिन्न अवधारणाएँ मिलती हैं।
आधुनिक
विज्ञान "Self" को प्रायः संज्ञानात्मक (Cognitive), तंत्रिका-विज्ञानात्मक
(Neural) और सामाजिक (Social) प्रक्रियाओं के समन्वय के रूप में समझने का प्रयास करता
है।
यहाँ
भी दोनों समान प्रश्न पूछते हैं— "मैं कौन हूँ?"
किन्तु
दोनों के उत्तरों की भाषा और आधार अलग-अलग हैं।
अनुभव
(Experience)
भारतीय
दर्शन प्रत्यक्ष अनुभव को ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता है।
समकालीन
चेतना-दर्शन भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव (Subjective Experience) को चेतना की मूल समस्या
स्वीकार करता है।
यहीं
से Hard Problem, Qualia तथा Phenomenology जैसे विमर्श उत्पन्न होते हैं।
इस
प्रकार अनुभव का प्रश्न दोनों परम्पराओं में केन्द्रीय है, यद्यपि उसकी व्याख्या अलग-अलग
है।
जहाँ
स्पष्ट भिन्नताएँ हैं
संवाद
की सम्भावना का अर्थ समानता नहीं है।
कई
विषय ऐसे हैं जहाँ दोनों परम्पराओं के निष्कर्ष वर्तमान समय में स्पष्ट रूप से भिन्न
हैं।
(क)
ब्रह्माण्डीय चेतना
वेदान्त,
कश्मीर शैव दर्शन तथा कुछ अन्य भारतीय परम्पराएँ सार्वभौमिक चेतना (Cosmic
Consciousness) को स्वीकार करती हैं।
मुख्यधारा
का आधुनिक विज्ञान वर्तमान में ऐसी किसी सार्वभौमिक चेतना की पुष्टि नहीं करता।
(ख)
आत्मा का अस्तित्व
भारतीय
दर्शन की अनेक परम्पराएँ आत्मा या जीव की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार करती हैं।
विज्ञान
के पास आत्मा के अस्तित्व या अनस्तित्व के पक्ष में कोई निर्णायक प्रायोगिक प्रमाण
उपलब्ध नहीं है।
इसलिए
विज्ञान सामान्यतः इस प्रश्न पर तटस्थ रहता है।
(ग)
पुनर्जन्म
भारतीय
दर्शन की अनेक शाखाएँ पुनर्जन्म को स्वीकार करती हैं।
आधुनिक
विज्ञान इस विषय पर अभी किसी सर्वमान्य निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा है।
कुछ
अनुसंधान हुए हैं, किन्तु उन्हें व्यापक वैज्ञानिक सहमति प्राप्त नहीं है।
अतः
पुनर्जन्म वर्तमान विज्ञान के लिए अभी एक खुला और विवादास्पद विषय है।
(घ)
मुक्ति (Liberation)
भारतीय
दर्शन में मुक्ति अस्तित्वगत (Ontological) और आध्यात्मिक लक्ष्य है।
आधुनिक
विज्ञान सामान्यतः मुक्ति जैसी अवधारणा का अध्ययन नहीं करता।
उसका
अध्ययन मानव व्यवहार, मस्तिष्क और अनुभव तक सीमित रहता है।
जहाँ
सावधानी आवश्यक है
वर्तमान
समय में चेतना-विमर्श से सम्बन्धित अनेक लोकप्रिय दावे किए जाते हैं।
उदाहरण
के लिए—
- "क्वांटम
भौतिकी ने वेदान्त को सिद्ध कर दिया।"
- "IIT
ने ब्रह्म को प्रमाणित कर दिया।"
- "Panpsychism
वही है जो उपनिषद कहते हैं।"
ऐसे
कथनों के प्रति अत्यन्त सावधानी आवश्यक है।
इनमें
कुछ सतही समानताएँ दिखाई दे सकती हैं, किन्तु समान शब्दावली का अर्थ समान सिद्धान्त
नहीं होता।
किसी
भी दो विचारों की तुलना तभी उचित है जब—
- उनकी
परिभाषाएँ स्पष्ट हों।
- उनके
सन्दर्भ समान हों।
- उनकी
पद्धतियों का सम्मान किया जाए।
- और
जहाँ भिन्नता हो, उसे भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए।
शोधपरक
ईमानदारी (Scholarly Integrity) की यही माँग है।
समन्वित
दृष्टि
यदि
निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान परस्पर विरोधी होने के
लिए बाध्य नहीं हैं।
दोनों
का अध्ययन-विषय अनेक स्थानों पर समान है— चेतना, अनुभव, मन, आत्मबोध, वास्तविकता
किन्तु
दोनों के प्रश्न पूछने की शैली, प्रमाण-व्यवस्था और निष्कर्ष भिन्न हैं।
विज्ञान
मुख्यतः "यह कैसे होता है?" (How?) का उत्तर खोजता है।
दर्शन
प्रायः "यह क्या है?" (What?) और "इसका अर्थ क्या है?"
(Why does it matter?) जैसे प्रश्न उठाता है।
जब
ये दोनों दृष्टियाँ अपने-अपने क्षेत्र की मर्यादा का सम्मान करते हुए संवाद करती हैं,
तभी ज्ञान का वास्तविक विस्तार सम्भव होता है।
दार्शनिक
समीक्षा
चेतना
का प्रश्न आज भी मानव ज्ञान की सबसे बड़ी सीमाओं में से एक है।
न
तो दर्शन इस विषय पर सर्वसम्मत है।
न
विज्ञान अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचा है।
किन्तु
यही अपूर्णता इस विषय को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
प्रश्न
जितना गहरा होता है, उसका उत्तर उतना ही बहुआयामी होता है।
इसलिए
चेतना का अध्ययन किसी एक अनुशासन का विषय नहीं, बल्कि मानव ज्ञान की समस्त परम्पराओं
का साझा बौद्धिक अभियान है।
आगे
की दिशा
इस
अध्याय की यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है।
अब
तक हमने प्रश्न उठाए, विभिन्न परम्पराओं का अध्ययन किया, मतभेदों को समझा और संवाद
की सम्भावनाओं का परीक्षण किया।
अब
शेष है—
एक
ऐसा समन्वित निष्कर्ष जो किसी मत को अंतिम सत्य घोषित न करे, बल्कि अब तक की सम्पूर्ण
यात्रा का दार्शनिक सार प्रस्तुत करे।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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