चिंतन - क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं?
चिंतन - क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं?
हम यह मानते हैं कि मनुष्य वही है, जो वह कहता है।
पर क्या सचमुच ऐसा है?
यदि ऐसा होता, तो संसार में कोई गलतफ़हमी जन्म ही न लेती।
शब्द सब कुछ कह देते।
और मौन की कोई आवश्यकता न रहती।
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं?
शब्द केवल भाषा का भाग हैं।
मनुष्य केवल भाषा नहीं है।
उसकी आँखों में एक अलग कथा चलती है।
उसकी मुस्कान का अपना व्याकरण होता है।
उसकी चुप्पी का अपना अर्थ होता है।
और उसके विरामों में वे वाक्य छिपे होते हैं, जिन्हें वह कह नहीं पाता।
कई बार कोई व्यक्ति कहता है—"मैं ठीक हूँ।"
पर उसकी आँखें उस वाक्य का खंडन कर देती हैं।
कई बार कोई बहुत बोलता है, केवल इसलिए कि वह अपने भीतर के मौन से बचना चाहता है।
और कई बार कोई बिल्कुल नहीं बोलता, क्योंकि उसके पास शब्दों से बड़े दुःख होते हैं।
मुझे लगता है कि मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके शब्दों में नहीं, उनके बीच के मौन में मिलता है।
विराम केवल बोलने का ठहराव नहीं है।
वह मन की खिड़की है।
वहीं से भीतर का आकाश दिखाई देता है।
संगीत में यदि केवल स्वर हों और उनके बीच कोई विराम न हो, तो वह शोर बन जाएगा।
कविता में यदि केवल शब्द हों और उनके बीच कोई मौन न हो, तो वह केवल गद्य रह जाएगी।
जीवन भी ऐसा ही है।
उसके सबसे सुंदर अर्थ विरामों में जन्म लेते हैं।
भारतीय दर्शन में मौन को केवल चुप रहना नहीं माना गया।
उसे सत्य के निकट जाने की एक अवस्था माना गया।
क्योंकि जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहीं अनुभूति आरंभ होती है।
और अनुभूति ही मनुष्य का वास्तविक परिचय है।
आज का समय शब्दों से भरा हुआ है।
संदेश हैं।
टिप्पणियाँ हैं।
बहसें हैं।
घोषणाएँ हैं।
पर क्या हम एक-दूसरे के विराम सुनते हैं?
क्या हम यह समझ पाते हैं कि किसी व्यक्ति ने उत्तर देने में देर क्यों की?
क्या हम यह देख पाते हैं कि उसकी हँसी आज पहले जैसी क्यों नहीं है?
क्या हम यह महसूस कर पाते हैं कि उसके भीतर कोई अनकहा बोझ है?
यदि नहीं—
तो हम उसके शब्द तो सुन रहे हैं,
उसे नहीं।
मुझे कभी-कभी लगता है कि प्रेम की शुरुआत शब्दों से नहीं होती।
वह तब शुरू होती है, जब कोई हमारे मौन को भी सुनने लगे।
जब उसे हर बात समझाने की आवश्यकता न पड़े।
जब वह हमारे चेहरे पर लिखी हुई थकान पढ़ ले।
जब वह हमारी आँखों में उतरते हुए प्रश्नों को पहचान ले।
वही संबंध सबसे गहरे होते हैं।
क्योंकि वहाँ भाषा समाप्त नहीं होती—
वह विस्तार पाती है।
अंततः मनुष्य को पढ़ना किसी पुस्तक को पढ़ने जैसा नहीं है।
पुस्तकें शब्दों से खुलती हैं।
मनुष्य विश्वास से।
और विश्वास तभी जन्म लेता है, जब हम उसके कहे हुए से अधिक, उसके अनकहे को सुनने लगते हैं।
तभी लगता है—
मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं।
क्योंकि जीवन की सबसे सच्ची पंक्तियाँ अक्सर लिखी नहीं होतीं—
वे दो शब्दों के बीच ठहरे हुए उस मौन में होती हैं,
जहाँ हृदय अपनी सबसे सच्ची भाषा बोलता है।
— मुकेश
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