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Friday, 2 November 2012

गर बिखरे न होते हम इस कदर तो,





गर बिखरे न होते हम इस कदर तो,
तुझसे संवार लेने की आरज़ू न करते
तुमसे बेहतर कोई मिल गया होता,
तो तुझसे आरजुए मुहब्बत न करते..
मुकेश इलाहाबादी --------------------

Thursday, 1 November 2012

जब, तुम्हारी सुआ पंखी सी झपकती आखें


जब,
तुम्हारी
सुआ पंखी सी
झपकती आखें
याद आती हैं
तब मै खो जाता हूँ
न खत्म होने वाले
बियाबान में
किसी रेगिस्तान में

जब
तुम्हारी याद आती है
तब सूखे पीले पत्ते सा
झर जाता हूँ
और उड़ता रहता हूँ
जंहा तक हवाएं ले जाती है
फिर जमीन पे तडफडाता  हूँ 
देर तक
फिर से उड़ जाने को
अपनी डाल से जुड़ जाने को

मुकेश इलाहाबादी ---------
 

ज़माना कहता है हमने दोस्ती में ये दगा कर लिया,





ज़माना कहता है हमने दोस्ती में ये दगा कर लिया,
चाँद आगोश में आया तो सितारों से तौबा कर लिया
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

राह तकते हों चिलमन से झांक कर शायद

 


 
राह तकते हों चिलमन से झांक कर शायद
इसी उम्मीद पे उनके कूचे से गुज़र जाते हैं
मुकेश इलाहाबादी --------------------------

शायद कुछ खुशबू हमारी रूह में भी बस जाए




शायद कुछ खुशबू हमारी रूह में भी बस जाए
इसी हसरत से फूलों की महफ़िल हम आये है
मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

जो खुशबू ज़माने भर को हो मयस्सर न उसकी आस रखते हैं



 

 

जो खुशबू ज़माने भर को हो मयस्सर न उसकी आस रखते हैं
हम ज़रा  शाही मिजाज़ के ठहरे,   सबसे अलग चाह  रखते हैं

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------------------

हमने तो खुल कर मांगना चाहा था उनका दिल,,


 


                                                                          हमने तो खुल कर मांगना चाहा था उनका दिल,,
                                                                          मगर वे चाहते थे मै उनसे ही चुरा लूं उनका दिल
                                                                          मुकेश इलाहाबादी --------------------------