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Tuesday, 18 August 2015

ज़िंदगी कब पूरी रही ?

ज़िंदगी कब पूरी रही ?
हर सांस अधूरी रही ! 
जब भी तुम साथ रहे  
वोह साँझ सिंदूरी रही 
हमेशा तेरे आरिज़ पे,   
इक लट बिखरी रही 
तेरी काली आखें  थी 
जो रात कजरारी रही 
तू इक दिन मेरी होगी 
यही आस अधूरी रही 

मुकेश इलाहाबादी ---

और तो कुछ नहीं रह गया

और तो कुछ नहीं रह गया 
दर्द  ही  दर्द बाकी रह गया 
मेला उजड़ गया, ज़ेहन में 
वो चेहरा गुलाबी रह गया 
ज़ख्म सारे भर गए, मगर 
इक घाव अंदरूनी रह गया
यूँ तो हमने सारी बातें की, 
जो कहना था वही रह गया
मुकेश दिल अपना ढूंढा रहा  
शायद तेरे दर पे ही रह गया    

मुकेश इलाहाबादी ------

Thursday, 13 August 2015

जब तप रहा होता है सूरज

जब
तप रहा होता है सूरज 
पूरी शान से 
और सुख रहा होता है 
खेत खलिहान 
नदी पोखर 
यहाँ तक की 
सूख चुके होती है 
जुबां और तालू भी 
तब भी , 
देखूं 
तुम्हारी कजरारी आखों में 
तो उत्तर आते हैं 
काले मेघ  
और भीग जाता है
तन और मन  - दोनो

मुकेश इलाहाबादी ------------------- 

Wednesday, 12 August 2015

बूँद - बूँद भरते हैं अमृत घट

रात, 
चाँद,  नींद और ख्वाब 
बूँद - बूँद
भरते हैं अमृत 
जिसे सुबह होते ही 
सूरज 
साजिशन 
बस के धक्कों 
सड़क के जाम 
बॉस की झिडक़ियों 
बढ़ती महंगाई 
और अनिश्चित भविष्य 
के साथ मिलकर सोख लेता है 
सारे अमृत बूँद 
लिहाज़ा एक बार फिर 
मै निढाल हो 
गिर पड़ता हूँ 
रात के आँचल में 
बूँद बूंद भरने को 
जीवन घट 

मुकेश इलाहाबादी -------

Monday, 10 August 2015

तमाम बहाने हैं मुस्कुराने को

तमाम बहाने हैं मुस्कुराने को 
वर्ना तो ढेरों ग़म हैं बताने को


तुझसे नही तेरे ख्वाब से कहूँगा 
आज की रात नींद में आने को


तुझ बिन नींद तो आने से रही 
दर्द से बोलूंगा लोरी सुनाने को


सावन की रिमझिम बारिस से 
कहूँगा तुमको झूला झूलाने को


मेरा दम निकले इसके पहले,
तुझसे कहूँगा इक बार आने को


मुकेश इलाहाबादी ----------

Tuesday, 4 August 2015

जैसे लौट आते हैं, पंक्षी

जैसे लौट आते हैं, पंक्षी 
फिर फिर अपने नीड में 
साँझ फिर फिर 
चूम लेती है 
रात के माथे को 
चिड़िया 
फिर फिर बैठती है 
उसी मुंडेर पे 
बस ऐसे ही 
मेरे सारे एहसास
सारे जज़्बात 
सिमट आते हैं 
तुम्हारी यादों की मुंडेर पे 
और चहचताते रहते हैं देर तक 
जब तक की ये यादें 
चूम नहीं लेती नींद का माथा 

मुकेश इलाहाबादी --------

एहसासों की होली जला कर


एहसासों की होली जला कर

चला गया मुझको रुला कर




लौट कर आएगा एक दिन

गया है, तसल्ली दिला कर



माना दिल उसका पत्थर

रहूंगा उसपे फूल खिलाकर




गर तू खुश रहना चाहे है ?

दर रोज़ मुझसे मिला कर




लोगों से सुना है मुकेश

खुश बहुत है मुझे भुला कर



मुकेश इलाहाबादी ------