होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 3 February 2012

ग़ज़ल जब तलक


ग़ज़ल जब तलक दिल से  नहीं निकलती
बात मीर, सौदा औ ग़ालिब सी नहीं बनती
----------------------------मुकेश इलाहाबादी

Thursday, 2 February 2012

गैरों से रफ्त ज़फ्त बढ़ाया नहीं



गैरों से रफ्त ज़फ्त बढ़ाया नहीं
अपनों  ने   हाथ  मिलाया  नहीं

वे आयेंगे मेरे घर उजाला बनके
इस उम्मीद पे चराग जलाया नहीं

उनकी आखों से मय पीने के बाद
कोई  और  नशा हमने चढ़ाया नहीं

गुलों से  दोस्ती कायम रहे अपनी
इसलिए कांटो का साथ गंवाया  नहीं

होगे तुम सिकंदर अपने ज़हान के
खुदा के सिवा कंही सर झुकाया नहीं




--------------------मुकेश इलाहाबादी




(maqbool fida Husain kee painting

Wednesday, 1 February 2012

कौन कहता है मुहब्बत ज़माने में नहीं बाकी


बैठे ठाले की तरंग  -------------------------------
कौन  कहता  है  मुहब्बत ज़माने में नहीं बाकी

वरना आप  हमसे और हम आपसे रूबरू न होते
------------------------------------मुकेश इलाहाबादी

यादों से ही दिल को एक अरसे से बहलाए हुए हैं


यादों से  ही  दिल  को एक अरसे से बहलाए हुए हैं
मुरझाये हुए फूलों को कब से सीने से  लगाए हुए हैं
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

बातें मुहब्बत की करते तमाम हैं

बैठे ठाले की तरंग ------------------

बातें  मुहब्बत  की  करते  तमाम हैं
जो लफ्जे वफ़ा से मह्फूम ज़नाब हैं 

--------------------- मुकेश इलाहाबादी 







                                                        (a painting of Great artist Picaso)

ज़मीन ही नहीं आसमां भी बेचते हैं


ज़मीन ही नहीं  आसमां  भी  बेचते हैं
जिस्म ही नहीं अपनी रूह भी बेचते है  

दुनिया तो अब एक ग्लोबल बाज़ार है
हम तो खुदा के साथ कायनात बेचते हैं 
-------------------------मुकेश इलाहाबादी

तू अपनी यादों को ज़रा समेट ले,

बैठे ठाले की तरंग ------------------



तू अपनी यादों को ज़रा समेट  ले,
मेरे ख़्वाबों से कुछ दूर तो हो ले,
मुद्दतों से अपने आप को  हूँ  भूला
ज़रा अपनी रूह से गुफ्तगूँ तो कर लूं





मुकेश इलाहाबादी ------------------