राख में दबे शोलों को क्यूँ तुमने हवा दी ?

राख में दबे शोलों को क्यूँ तुमने हवा दी ?
अब संभालो अपना दामन क्यूँ तुमने हवा दी ?

पसीने से तरबतर थका बहुत था, अब तो,
सो गया मुसाफिर आँचल से क्यूँ तुमने हवा दी ?

रुस्वाइयां ज़माने में जो इतनी हो रही हैं,थी
बात अपने दरम्याँ की इतनी क्यूँ तुमने हवा दी ?  

मुकेश इलाहाबादी -------------------------------
-

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है