मुद्दतो पहले कभी ,,,,,,
एहसास की कुछ बूंदे छलके थे उनकी आखों से
जिसकी नमी से आज तक मेरा वज़ूद भीगा है
मुकेश इलाहाबादी --------------------------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”