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Saturday, 6 April 2013

मेरी तन्हाई पे हँसता हुआ शोर

 
मेरी तन्हाई पे  हँसता हुआ शोर
तेरी पाजेब की झंकार लगे  है

सहमा सहमा खिला हुआ गुलाब
जाने क्यूँ मुझको अंगार लगे है

क्षितिज पे डूबता हुआ आफताब
मुझको धरती का श्रींगार लगे है

मुकेश इलाहाबादी -------------------

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