अभी भी हरहरता है

अभी भी
हरहरता है
अंतश में
बेचैन सागर
वाष्प बनकर
उड़ जाने को
अनंत आकाश में
तमाम कोशिशों के
बावजूद
तप्त सूर्या रश्मियाँ
लौट जाती हैं
महज़ चमड़ी को
सुखाकर

मुकेश इलाहाबादी ------

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