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Thursday, 12 June 2014

तुमसे उम्मीदे वफ़ा भी नहीं

तुमसे उम्मीदे वफ़ा भी नहीं
तुमसे ग़िला शिकवा भी नहीं

यंहा कोई समंदर नहीं बहता
औ यहां कोई दरिया भी नहीं

ये पत्थर के बुतों का शहर है
और यहां कोई  खुदा भी नहीं

ज़रा सी बात पे तुम रूठे, जो 
इतना बड़ा मसअला भी नहीं

मुकेश इलाहबादी ------------

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