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Thursday, 10 July 2014

शहर ग़मज़दा था

शहर ग़मज़दा था
कुछ तो हुआ था

हर इंसान चुप था
हर शख्श ख़फ़ा था

हवाएं बोलती थी
सन्नाटा चीखता था

वह घर जा रहा था
बेक़सूर मारा गया था

मुकेश तुम चुप रहो
कितनी बार कहा था

मुकेश इलाहाबादी ---