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Saturday, 13 September 2014

ज़िंदगी के लिए,

ज़िंदगी के लिए,
हरारत बचाए रक्खा है
तेरी यादों का अलाव
जलाए रक्खा है

जो साल गुज़ारा है
संग - साथ तेरे  
वो कॅलेंडर आज भी
लगाए रक्खा है

तू बाम पर आये या न आये,
तेरे दर पे आने का सिलसिला
बनाए रक्खा है

रिश्तों के गुल
मुरझा गए तो क्या ?
वो फूल आज भी
सजाए रक्खा है   

मुकेश इलाहाबादी -------------