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Monday, 15 September 2014

तुमसे मै सच कहता हूँ

तुमसे मै सच कहता हूँ
दर्द के घर में रहता हूँ

इन सारे ज़ख्मो से अब
रातों दिन बातें करता हूँ

अपनी हर धड़कन में
तेरी सरगम सुनता हूँ

दिन कैसे भी गुज़रें पर
ख्वाब सुनहरे बुनता हूँ

इश्क़ आग का दरिया है
मै पाँव बरहना चलता हूँ

मुकेश इलाहाबादी ------